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बड़ी आर्थिक चुनौती

कोरोना के असर से अर्थव्यवस्था के जिस तेजी से उबरने की उम्मीद थी, दूसरी लहर ने उस पर पानी फेर दिया है। वित्त वर्ष 2022 में पहले जहां देश की ग्रोथ 11-14 फीसदी रहने का अनुमान लगाया जा रहा था, अब उसे घटाकर 8.5-10 फीसदी कर दिया गया है। वित्त वर्ष 2021 में ग्रोथ माइनस 7.3 फीसदी रही। कोरोना महामारी की पहली लहर में ग्रामीण क्षेत्रों पर ज्यादा असर नहीं हुआ था और वहां की इकॉनमी मजबूत बनी हुई थी। दूसरी लहर में गांवों पर इसका व्यापक असर हुआ है, जिससे खपत में कमी आने की आशंका है। मई में लॉकडाउन के कारण जहां कंपनियों के प्रॉडक्शन और दुकानों से बिक्री प्रभावित हुई, वहीं लोगों ने अनिश्चितता के कारण खर्च घटाया। इसलिए मई में अप्रैल की तुलना में टीवी, एसी, फ्रिज और वॉशिंग मशीन की बिक्री में 65 फीसदी, स्मार्टफोन की बिक्री में 30 फीसदी की कमी आई। अप्रैल में जहां कंपनियों ने शोरूम में 2 लाख 86 हजार पैसेंजर गाड़ियां भेजी थीं, वहीं मई में इनकी संख्या घटकर 1 लाख से कुछ अधिक रह गई। प्रॉडक्शन और खपत में कमी का रोजगार पर भी बुरा असर हुआ है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) का दावा है कि मई महीने में 1.5 करोड़ लोगों की नौकरी चली गई और 30 मई को खत्म सप्ताह में शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 18 फीसदी के साथ पिछले एक साल में सबसे अधिक हो गई। जून में कई राज्यों में लॉकडाउन में ढील दी गई है, इसलिए हालात कुछ बेहतर हो सकते हैं, लेकिन महामारी के पहले के स्तर तक पहुंचने में अर्थव्यवस्था को वक्त लगेगा। यहां यह बात भी याद रखनी चाहिए कि पिछले साल महामारी के आने से पहले भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ी हुई थी। महामारी ने इस मोर्चे पर दिक्कत बढ़ा दी है और समाज के सभी वर्गों पर इसका असर पड़ा है। कोरोना की दूसरी लहर से पहले प्यू रिसर्च का एक सर्वे आया, जिसमें बताया गया कि 2020 में भारत में मध्यवर्गीय लोगों की संख्या में 3.5 करोड़ की कमी आई।

इसी तरह से अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल 23 करोड़ लोग गरीबी की दलदल में फंस गए। सरकार ने पिछले साल अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए बड़ा राहत पैकेज दिया था। सरकारी खजाने की हालत ठीक नहीं, इसलिए अभी उसके लिए ऐसा करना मुश्किल है। इसलिए उदय कोटक जैसे उद्योगपतियों ने कहा है कि रिजर्व बैंक अधिक नोट छापे और सरकार अपनी बैलेंट शीट बढ़ाए। लेकिन अभी तक सरकार की ओर से मौजूदा आर्थिक मुश्किलों से कैसे निपटा जाएगा, इसके संकेत नहीं मिले हैं। यह बात भी तय है कि जब तक लोगों के हाथ में खर्च करने लायक पैसा नहीं बढ़ेगा, तब तक खपत बढ़ने की उम्मीद नहीं है। इसमें बढ़ोतरी इसलिए जरूरी है क्योंकि देश की जीडीपी में सबसे बड़ा योगदान इसी का है।

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