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बदनीयती का वायरस

दुनिया कोविड-19 को काबू करने के उपाय ढूंढ रही है, उधर इस महामारी के फैलने की वजह पर जमी धुंध छंटने का नाम नहीं ले रही। दिसंबर 2019 में चीन ने अपने यहां पहले मामले की पुष्टि की थी। उसके बाद चीन और कई दूसरे देशों के वैज्ञानिकों ने कहा कि चमगादड़ से इंसानों तक पहुंचा। बीच-बीच में लैब में प्रयोग के दौरान वायरस लीक होने की आशंका भी जताई गई, लेकिन तब अधिकतर वैज्ञानिकों ने उसे तवज्जो नहीं दी। इस बीच चीन एक अहम जानकारी छिपाए रहा। अब अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के हवाले से पता चला है कि वूहान में महामारी शुरू होने से पहले नवंबर 2019 में वूहान इंस्टिट्यूट ऑफ वायरॉलजी के 3 रिसर्चर गंभीर रूप से बीमार पड़े और उनमें कोविड-19 जैसे लक्षण थे। वूहान इंस्टिट्यूट पर वैसे भी वैज्ञानिकों की नजरें रही हैं। वहां SARS के विषाणुओं पर अध्ययन हुए थे। लाइव वायरस पर भी प्रयोग वहां चलते रहते हैं। वहां की टॉप साइंटिस्ट डॉ. शी जेंगली ने कृत्रिम वायरस बनाने की पढ़ाई की थी अमेरिका में। डॉ. शी के नेतृत्व में युन्नान प्रांत की एक खदान से चमगादड़ों के सैंपल लिए गए थे, जिनमें कोरोना खानदान के वायरस मिले। उस खदान में 2012 में छह मजदूर अचानक बीमार पड़े थे।

डॉ. शी ने माना है कि उनकी लैब में कोरोना खानदान के विषाणुओं पर प्रयोग हो रहे थे। देखा जा रहा था कि विषाणु अपने स्पाइक प्रोटीन को इंसानी कोशिका के एंजाइम पर चिपका सकता है या नहीं। डॉ. शी का दावा है कि ऐसे प्रयोग भविष्य में आ सकने वाली महामारियों का अंदाजा लेने के लिए किए जा रहे थे। दुनिया के कई वैज्ञानिक ऐसे प्रयोगों को पूरी तरह गलत नहीं मानते, लेकिन वे लैब से लीकेज का सवाल उठा रहे हैं। चीन न तो लीकेज की बात मान रहा है और न ही पूरी जांच करने दे रहा। इस साल विश्व स्वास्थ्य संगठन की जो टीम चीन गई, उसे भी वूहान लैब के पूरे रेकॉर्ड नहीं दिखाए गए। इस बीच, ब्रिटेन और नॉर्वे के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि वूहान लैब में लीकेज से भी कहीं ज्यादा खतरनाक मामला है। वहां कृत्रिम कोरोना वायरस बनाए गए। फिर रेट्रो जेनेटिक इंजीनियरिंग से उनको नैचरल स्वरूप देने की कोशिश की गई ताकि किसी को शक न हो। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने खुफिया एजेंसियों को लैब लीक के पहलू की 90 दिनों में जांच करने को कहा है। विश्व समुदाय को चीन पर दबाव बढ़ाना चाहिए, जिसकी नीयत ठीक नहीं दिख रही। लाखों जिंदगियां तबाह हो चुकी हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि वायरस किस तरह इंसानों तक पहुंचा। यह पता चलने पर ही भविष्य के लिए सुरक्षा उपाय किए जा सकेंगे, इंसान और जानवर के संपर्क के दायरे से लेकर प्रयोगशालाओं तक।

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