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साइंस ही बचाएगा

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन की कड़ी आपत्ति के बाद योग गुरु बाबा रामदेव ने आखिर अपना वह बयान वापस ले लिया जिसमें आधुनिक चिकित्सा को तमाशा बताते हुए कहा गया था कि एलोपैथी दवा खाने से लाखों कोरोना मरीजों की जान चली गई। इंडियन मेडिकल असोसिएशन ने इस बयान पर स्वामी रामदेव के खिलाफ महामारी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग की थी। उनके बिना शर्त बयान वापस लेने के बाद उम्मीद करनी चाहिए कि यह अनावश्यक विवाद शांत हो जाएगा। आधुनिक चिकित्सा पद्धति को लेकर देशवासियों के बड़े हिस्से में पहले से ही कई तरह की भ्रांतियां हैं। इन भ्रांतियों की वजह से अस्पतालों, दवाओं और टीकों के बारे में किसी भी तरह की अफवाह फैलना और लोगों का उसके प्रभाव में आ जाना आसान होता है। ऐसी ही अफवाहों का एक दुष्प्रभाव पिछले दिनों यूपी के बाराबंकी में तब देखने को मिला, जब तमाम कठिनाइयों के बीच गांव वालों को टीका लगाने पहुंची टीम को देखकर लोग बुरी तरह डर गए और इधर-उधर भागने लगे। टीके लगाने से बचने के लिए बहुत सारे लोग नदी में कूद गए। कुछ अन्य जगहों से स्वास्थ्य विभाग की टीम पर गांव वालों के पत्थर बरसाने की भी खबरें आई हैं।

पहले से ही असाधारण दबावों के बीच काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों का मनोबल ऐसी घटनाओं से टूटता है। हालांकि आम लोगों के बीच फैली गलतफहमियों की एक वजह समय-समय पर कोरोना की चिकित्सा से जुड़ी परस्परविरोधी खबरों का आना भी है। कभी कहा जाता है कि प्लाज्मा थेरपी लोगों की जान बचा रही है, इसलिए कोरोना से उबर चुके अधिक से अधिक लोग प्लाज्मा दान करें। फिर कहा जाता है कि प्लाज्मा से कोरोना की चिकित्सा में कोई मदद नहीं मिलती। कभी रेमडेसिविर को रामबाण इलाज बताया जाता है जिससे उसकी कालाबाजारी शुरू हो जाती है। फिर कहा जाता है उसका कोई खास उपयोग नहीं है। दो टीकों के बीच अंतराल को लेकर भी दावे बदलते रहते हैं। इन सबसे देशवासियों के एक हिस्से में यह राय बनती है कि बड़े-बड़े डॉक्टर खुद कन्फ्यूज हैं, उन्हें पता ही नहीं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। लेकिन समझना जरूरी है कि मॉडर्न मेडिसिन और साइंस का यही तरीका है। प्रयोग करना, उन्हें खुलेआम आजमाना और फिर सुधारना- इसी प्रक्रिया से साइंस आगे बढ़ता है। इसी प्रक्रिया के जरिए मॉडर्न मेडिकल साइंस ने अनेकानेक घातक बीमारियों से समाज को मुक्त किया है। आजादी के वक्त देशवासियों की जो औसत उम्र महज 31 वर्ष थी वह अब बढ़कर करीब 70 वर्ष हो गई है। यह मॉडर्न मेडिकल साइंस की ही बदौलत संभव हुआ है। कोरोना एक नया वायरस है जिसके बारे में पहले से किसी को कुछ पता नहीं था। स्वाभाविक ही शुरू में हर तरीके को आजमाना होगा। अच्छी बात यह है कि मेडिकल साइंस से जुड़े लोग गलतियों को स्वीकारने और सुधारने में देर नहीं कर रहे। इसी विधि से हम इस पर काबू पाएंगे। पा भी रहे हैं।

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