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तालमेल से बनेगी बात

केंद्र सरकार ने सोमवार को में वैक्सीन पॉलिसी पर अपने रुख का बचाव करते हुए कहा कि महामारी से कैसे निपटना है, यह कार्यपालिका पर छोड़ देना चाहिए। सरकार की दलील है कि चूंकि कोर्ट की इस मामले में कोई विशेषज्ञता नहीं है, इसलिए उसकी दखलंदाजी, नेक इरादों के बावजूद बेहद गंभीर नतीजों को जन्म दे सकती है। सिद्धांत रूप में केंद्र सरकार के इस रुख से असहमत होना मुश्किल है। संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र बंटे हुए होते हैं और यह स्थिति हमेशा अच्छी मानी जाती है कि तीनों अपना-अपना काम पूरी निष्ठा से करते हुए दूसरों के अधिकार क्षेत्र में दखल देने से बचे रहें। आम तौर पर ऐसा होता भी है। समस्या कुछ खास स्थितियों में होती है, जब या तो तीनों में से कोई अंग अपना दायित्व ठीक से नहीं निभाता या फिर किसी का दायित्व बोध उसे उस मामले में भी कुछ कहने-करने को मजबूर करता है, जिसे दूसरा अंग अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत मानता है। मौजूदा मामला इसी दूसरी श्रेणी का है, जिसमें कोरोना की बेकाबू हुई दूसरी लहर में लोगों को ऑक्सिजन और दवाओं के अभाव में असहाय देख न्यायपालिका को लगा कि वह मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती।

वैक्सीन की कीमतों से जुड़े मौजूदा मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि सुओमोटो सुनवाई शुरू की, लेकिन फिर भी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उसे अपनी सीमाओं का ध्यान नहीं है। उसने यह साफ कर दिया था कि उसका इरादा किसी भी रूप में सरकार की नीति की जगह अपनी नीति देने का नहीं है। हां, उसने सरकार की नीति को लेकर कुछ चिंताएं जरूर जाहिर कीं। ये चिंताएं सिर्फ न्यायपालिका की नहीं हैं। समाज के अलग-अलग हिस्से इन सवालों को स्वर देते रहे हैं। उदाहरण के लिए, यह आशंका कई लोगों ने जाहिर की है कि वैक्सीन की अलग-अलग कीमतों का बुरा असर वैक्सिनेशन कार्यक्रम पर पड़ सकता है। यही नहीं, महामारी के अन्य पहलुओं पर भी सरकार की तैयारी और उसके रिस्पॉन्स को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। सरकारी तंत्र मरीजों की जान बचाने में लगे अस्पतालों तक जरूरी सुविधाएं और आवश्यक दवाएं, इंजेक्शन, ऑक्सिजन आदि समय से पहुंचने की व्यवस्था नहीं कर पा रहा, यह तो है ही, इसकी शिकायत करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई के भी उदाहरण देखे गए हैं। ऐसे में अदालतें अगर आम लोगों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा में आगे आती हैं तो अपना कर्तव्य ही पूरा करती हैं। बहरहाल, इसमें संदेह नहीं कि महामारी से कुशलता से निपटना कार्यपालिका की जिम्मेदारी है और संकट के इस दौर में शासन के बाकी सभी अंगों की भूमिका उसे इस जिम्मेदारी का कुशलतापूर्वक निर्वाह करने में मदद देने की ही हो सकती है, यही होनी चाहिए।

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