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सबका साथ है जरूरी

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकार पर से निपटने में पूरी तरह नाकाम रहने का आरोप लगाते हुए मांग की है कि सरकार तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाकर विस्तार से पूरी स्थिति स्पष्ट करे। यकीनन सरकार उनके आरोपों का भरपूर खंडन करेगी, लेकिन मीटिंग के उनके सुझाव पर गौर करना ठीक रहेगा। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते है। लेकिन देश में कोरोना की दूसरी लहर ने जो हालात पैदा कर दिए हैं, वे किसी भी सूरत में सामान्य नहीं कहे जा सकते। दवाएं, अस्पताल, आईसीयू बेड, ऑक्सिजन, वैक्सीन हर मोर्चे पर कमियां दिख रही हैं। लोग उन कमियों की वजह से जूझते, बिलखते और मरते देखे जा रहे हैं। सरकार अपने स्तर पर कोशिश कर रही है, लेकिन उन कोशिशों की सीमाएं साफ दिख रही हैं। इसके उलट ऑक्सिजन की कोई कमी नहीं है, लेकिन सही वक्त पर और सही मात्रा में उसे मुहैया कराने की चुनौती बनी हुई है।

इसी क्रम में कई गैरबीजेपी शासित राज्यों की सरकारों का केंद्र सरकार से विवाद भी बढ़ता दिख रहा है। कुल मिलाकर स्थिति यह हो गई है कि महामारी के इस दौर में जब सबको एकजुट होकर इस चुनौती का सामना करने की जरूरत थी, तब विभिन्न दलों और अलग-अलग सरकारों के अलग-अलग सुर निकल रहे हैं। ऐसे में यह पहली जरूरत है कि सभी राजनीतिक दलों और उनसे जुड़ी सरकारों में तालमेल बनाया जाए। इसका सबसे अच्छा उपाय यही हो सकता है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जल्द से जल्द एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए जिसमें सरकार पूरी पारदर्शिता के साथ सारे तथ्य रखे और देश की राजनीतिक बिरादरी को विश्वास में ले। लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों को विश्वास में लेने की दिशा में पहला कदम होता है जनप्रतिनिधियों को विश्वास में लेना। हालांकि कोरोना संक्रमण शुरू होने के बाद से दो बार सर्वदलीय बैठक हो चुकी है। पहली बैठक पिछले साल 8 अप्रैल को हुई थी जब देश में 21 दिनों का पहला लॉकडाउन चल रहा था। दूसरी सर्वदलीय बैठक 4 दिसंबर को हुई जब वैक्सीन जल्द ही तैयार हो जाने की उम्मीद बन चुकी थी।

हालात उस वक्त भी बुरे थे, लेकिन तब न तो सरकारी तंत्र ऐसा असहाय नजर आ रहा था और न ही आम लोगों में ऐसी निराशा थी। इसलिए आज पहले से भी ज्यादा जरूरी है कि सरकार सभी राजनीतिक दलों के नेतृत्व को साथ लेने की पहल करे। इन दलों के चुनावी हित अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन आखिर सबको इसी देश में, इसी जनता के बीच राजनीति करनी है, उसी के समर्थन से आगे बढ़ना है। आज जब बात देश की है, आम जनता की है तो सबका दायित्व है कि छोटे-छोटे हितों से ऊपर उठें। सब उठेंगे भी, लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदारी सरकार की है, इसीलिए पहल भी उसे ही करनी चाहिए।

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