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मौसम के बदले तेवर

मौसम की गर्मी ने इस साल अभी से अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं। मौसम विभाग ने शनिवार तीन अप्रैल को लू चलने की चेतावनी दी है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश सहित दस राज्यों में अलर्ट जारी की गई है। इससे पहले मार्च महीने का औसत अधिकतम तापमान 33.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से साढ़े तीन डिग्री सेल्सियस अधिक था। इसे पिछले 11 सालों में सबसे गर्म मार्च बताया गया है। होली के दिन तो पारे ने 76 साल का रेकॉर्ड तोड़ दिया। राजधानी दिल्ली में उस दिन अधिकतम तापमान 40.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो उसे 31 मार्च 1945 के बाद से दिल्ली में मार्च का सबसे गर्म दिन बनाता है।

बहरहाल, यह तो शुरुआत है। इस समय आम तौर पर देश में तापमान 30 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है जबकि राजस्थान के कई इलाकों में पारा 40 पार कर चुका है और मौसम विभाग लू के थपेड़ों को लेकर आगाह कर रहा है। तकनीकी शब्दावली में, तापमान सामान्य से कम से कम 4.5 डिग्री बढ़ जाए तो उसे हीटवेव या लू कहा जाता है और सामान्य से 6.5 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाए तो वह सीवियर हीटवेव की स्थिति मानी जाती है। तापमान में अचानक आने वाली यह बढ़ोतरी काफी हानिकारक होती है। इससे मौसमी बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है।

कोरोना महामारी ने पिछले करीब साल भर से न केवल आम लोगों को बल्कि हमारे पूरे स्वास्थ्य तंत्र को असाधारण तनाव में रखा है। ऐसे में मौसमी उतार-चढ़ाव से उपजी सामान्य बीमारियां भी एक हद से ज्यादा बढ़ीं तो यह देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती साबित हो सकती है। तापमान में बढ़ोतरी का यह ट्रेंड नया नहीं है। 2020 भी पिछले 119 बरसों में आठवां सबसे गर्म साल था।

बाढ़, भारी बारिश, बिजली गिरने, कोल्ड वेव और हीट वेव जैसी एक्स्ट्रीम वेदर इवेंट्स के लिहाज से कौन-सा देश कितने जोखिम में है, इसका पता क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स से चलता है। इस इंडेक्स में भारत 20वें नंबर यानी अधिक जोखिम वाले वर्ग में है। ऐसे मौसम के कारण देश को सालाना 70 हजार करोड़ रुपये तक का नुकसान भी होता है। भारत के विज्ञान मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने हाल ही में कहा था कि हाल के दशकों में दुनिया भर में एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स बढ़ी हैं और आने वाले समय में और बढ़ेंगी। यह सब जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है।

इसी कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है और यही मौसम में इतने भारी-उतार चढ़ाव की वजह बन रहा है। जलवायु परिवर्तन को रोकने की पेरिस समझौते जैसी पहल में भारत अगुवा देश है। सौर और पवन ऊर्जा की क्षमता बढ़ाकर भारत इसके लिए अपनी ग्रीन इकॉनमी का भी विस्तार कर रहा है। लेकिन यह लड़ाई जितनी बड़ी है, उसे देखते हुए हमें ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कमी लानी होगी। यह हमारे कल के लिए जितना जरूरी है, उतना ही आज के लिए।

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