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भारत-पाकः कट्टी के बाद फिर दोस्ती

भारत-पाक रिश्तों के मोर्चे पर इधर कुछ समय से पॉजिटिव संकेत मिल रहे हैं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में कहा कि पाकिस्तान के लोग भी दोनों देशों के बीच शांति और सहयोग का संबंध देखना चाहते हैं। इसके ठीक बाद खबर आई कि पाकिस्तान ने भारत से कॉटन और यार्न के आयात पर लगी रोक हटाने का फैसला कर लिया है। इससे पहले पाकिस्तान के गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाक पीएम इमरान खान को पत्र भेजकर बधाई दी थी। इसी पत्र का जवाब इमरान खान ने दिया है। इससे पहले दोनों देशों की सेना में युद्धविराम समझौते का पालन करने पर सहमति बनी और फिर पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने कहा कि दोनों देशों को पुरानी बातें पीछे छोड़कर शांति और सहयोग की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। इन सबसे सकारात्मक माहौल बना जिसने व्यापार शुरू होने की राह आसान की। हालांकि अभी इस मामले में कुछ औपचारिकताएं बाकी हैं, लेकिन दोनों पक्षों से मिल रहे सकारात्मक संकेतों को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि इसमें और अड़चन नहीं आएगी।

वैसे देखा जाए तो तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद 2014 में एनडीए शासन शुरू होने के बाद काफी समय तक दोनों देशों के रिश्तों में उत्साह बना रहा। प्रधानमंत्री मोदी का नवाज शरीफ के परिवार में हो रही शादी के मौके पर औपचारिक निमंत्रण के बगैर पहुंच जाना रिश्तों की गर्मजोशी का ऐसा सबूत है जो कूटनीतिक हलकों में याद रखे जाने लायक माना गया। यहां तक कि जनवरी 2016 में हुए पठानकोट आतंकी हमले के बाद भी दोनों सरकारों के बीच यह समझ बनी रही कि कुछ नॉन स्टेट ऐक्टर हैं जिनकी कोशिश हर कीमत पर भारत-पाक रिश्तों को बिगाड़ने की है। इनसे मुकाबले के लिए दोनों सरकारों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान से जांच के लिए आई टीम को पठानकोट एयरबेस में जाकर गवाहों और चश्मदीदों से पूछताछ करने दिया गया। मगर उसी साल सितंबर में हुए उड़ी हमले के बाद हालात बदल गए। फिर रही-सही कसर पुलवामा हमले ने पूरी कर दी।

बहरहाल, एक साझा संस्कृति से जुड़े हुए दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी देशों के पास बातचीत से मसले सुलझाने और शांति-सहयोग के रिश्ते कायम करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। इसीलिए युद्ध में उतरने की हद तक जाने के बाद भी भारत और पाकिस्तान फिर-फिर वार्ता की मेज पर वापस लौटते रहे हैं। यह क्रम इतनी बार दोहराया जा चुका है कि किसी भी पक्ष की छोटी से छोटी हरकत भी जानी-पहचानी लगने लगी है। इसमें कुछ खास हो सकता है तो यही कि इस बार सिर्फ दोस्ती करने की नहीं बल्कि उसे टिकाने की भी तरकीब ढूंढी जाए। उम्मीद करें कि दोनों देशों का नेतृत्व 2021 में कुछ ऐसी जुगत निकालेगा कि रिश्ते न सिर्फ क्रिकेट और कारोबार से आगे जाएं बल्कि इतने पारदर्शी हों कि किसी की चालबाजी से चकनाचूर न हों।

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