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रहने लायक शहर : रोजगार की जगहों को सुंदर, सुविधाजनक बनाने की चुनौती

केंद्रीय आवास तथा शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा गुरुवार को जारी की गई शहरों की रैंकिंग कई लिहाज से महत्वपूर्ण है। साफ-सफाई और अन्य सुविधाओं के आधार पर शहरों की रैंकिंग पहले से होती आई है। इस बार ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स में इन शहरों की गुणवत्ता को वहां रहने वाले लोगों की नजर से कुछ खास पैमानों पर नापने की कोशिश की गई है। दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में बेंगलुरु, पुणे और अहमदाबाद तथा दस लाख से कम आबादी वाले शहरों में शिमला, भुवनेश्वर और सिलवासा को क्रमशः पहला, दूसरा और तीसरा स्थान मिला। दिलचस्प बात है कि बड़े शहरों में मोस्ट लिवेबल सिटी का ताज भले बेंगलुरु को मिला हो, पर क्वॉलिटी ऑफ लाइफ के आधार पर चेन्नै, कोयंबटूर और नवी मुंबई को क्रमशः पहला, दूसरा और तीसरा स्थान दिया गया।

क्वालिटी ऑफ लाइफ में सस्ते आवास, साफ पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं, सुरक्षा तथा मनोरंजन के साधनों की उपलब्धता जैसे कारक रखे गए थे। मगर किसी भी शहर की लिवेबिलिटी इस सवाल को परे रखकर अधूरी ही मानी जाएगी कि वह शहर रोजगार के कितने और किस तरह के अवसर उपलब्ध करा सकता है। साफ हवा, पानी, सुंदर दृश्य, सड़कों पर कम ट्रैफिक और घर के आसपास बाजार, हॉस्पिटल जैसे सुविधाएं किसी शहर को रहने लायक बनाती हैं, लेकिन वहां रहने वाले काम क्या करेंगे, उनकी आजीविका के साधन क्या होंगे इन सवालों से ही यह तय होता है कि वहां कौन लोग बसने आएंगे। आजीविका के अभाव में वहां पेंशन पर गुजारा करने वाले या किसी और की कमाई पर आश्रित लोग जरूर आएंगे, लेकिन कमाकर खाने वाली आबादी नहीं आ पाएगी। अगर ये सुविधाएं मिल गई तो इसका मतलब यह होगा कि वहां तरह-तरह के कारखाने लगेंगे। इससे एक तो काम की तलाश में आने वालों की संख्या बढ़ेगी, दूसरे प्रदूषण भी बढ़ेगा जिसका नतीजा यह हो सकता है कि कुछ समय में वे पहले की तरह ‘रहने लायक’ न रह जाएं। जैसा कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों के साथ हुआ या हो रहा है।

इसी बिंदु पर अर्बन प्लानिंग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हमारे सामने लंदन जैसे शहरों के उदाहरण हैं जो किसी जमाने में दुनिया के सबसे बड़े रोजगार केंद्रों में शुमार होते थे और सबसे गंदे शहरों में उनकी गिनती होती थी। पर समय के साथ वे बहुत सारे रोजगार देने के बावजूद सुंदर, साफ और बेहतरीन शहरों में शुमार हुए। ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स इस मायने में तो उपयोगी है ही कि यह शहरों में उपलब्ध सुविधाओं को वहां रहने वालों की नजर से समझने का मौका देता है, पर इसकी सबसे बड़ी सार्थकता इस बात में होगी कि देश की श्रमशील और उत्पादक आबादी को अपनी ओर खींचने वाले शहरों को अधिक से अधिक रहने लायक भी बनाया जा सके।

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