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कांग्रेस में बगावत

जम्मू में ग्लोबल गांधी फैमिली नाम के एक एनजीओ के बैनर तले असंतुष्ट कांग्रेसी नेताओं के आयोजन ने तिनके की वह आड़ भी खत्म कर दी, जो अब तक उनकी गतिविधियों को ढके हुए थी। अब इस बात में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है कि कांग्रेस के इन वरिष्ठ असंतुष्ट नेताओं के निशाने पर पार्टी का मौजूदा नेतृत्व, या ज्यादा सटीकता के साथ कहा जाए तो गांधी परिवार है। तमाम नेताओं ने जितने खुले अंदाज में अपनी बात रखी, उससे साफ हो जाता है कि वे पार्टी नेतृत्व के साथ मिल-बैठकर कोई सर्वमान्य फॉर्म्युला निकालने की गुंजाइश अब न तो देख रहे हैं और न ऐसी कोई इच्छा रखते हैं। बात अब पार्टी नेतृत्व को समझाने-बुझाने, उसे कन्विंस करने से कहीं आगे निकल गई है। ताजा प्रयास उस पर दबाव बनाने और उसे अपनी बात मानने को मजबूर करने का लगता है। आसान भाषा में इसे खुली बगावत कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

अब सवाल एक ही रह गया है कि पार्टी नेतृत्व इस बगावत को किस रूप में लेता है। वह इसे पार्टी के अंदर का मसला बताते हुए इन नेताओं के आगे सरेंडर करने का रास्ता अपनाता है, या परिधि पर खड़े नेताओं को वापस आने का मौका देते हुए असंतोष के केंद्र को कुचलने की कोशिश करता है। अब तक के संकेतों से यही लगता है कि पार्टी नेतृत्व देर-सबेर पहला ही रास्ता अपनाने के मूड में है। बल्कि कहा जाए, वह इस रास्ते पर चलना शुरू कर चुका है। अगर ऐसा न होता तो इन असंतुष्ट नेताओं की यह शिकायत नहीं होती कि गुलाम नबी आजाद को राज्यसभा से रिटायर होने के बाद हाशिये पर पहुंचाने की व्यवस्था कर दी गई है। सोनिया गांधी के नाम पत्र लिखकर चर्चा में आए जी-23 समूह के रूप में पहचाने जा रहे इन सभी नेताओं को आशंका है कि पार्टी में देर-सबेर उनकी भी वही नियति होगी, जो गुलाम नबी आजाद की हो रही है। इसलिए स्वाभाविक रूप से समय रहते वे सब इकट्ठा होकर आवाज बुलंद करने की जरूरत महसूस कर रहे हैं। लेकिन उनके इस प्रयास से आमने-सामने की जो स्थिति बन गई है, उसमें उनकी मांगें मानने का मतलब होगा कि गांधी परिवार अपनी अप्रासंगिकता स्वीकार कर रहा है। गांधी परिवार ही नहीं, पूरी कांग्रेस भी इसे स्वीकार कर पाएगी या नहीं और कर लिया, तो बनी रह पाएगी या नहीं, इस बारे में कुछ कहना मुश्किल है। वजह यह है कि अपने मौजूदा स्वरूप में कांग्रेस जो भी है, जैसी भी है, वह गांधी परिवार के सहारे ही है। जाहिर है, दोनों पक्षों की ओर से जोर आजमाइश के बगैर इस प्रकरण का अंत नहीं दिख रहा। सवाल बस यह है कि इस जोर आजमाइश के चक्कर में पार्टी टूटेगी या इसका कोई एक छोटा सा धड़ा अलग होगा, और यह भी कि इस क्रम में विपक्ष की इस सबसे बड़ी पार्टी की और कितनी दुर्गति होनी बाकी है।

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