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जंग बन गए हैं चुनाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम में एक रैली को संबोधित करते हुए संकेत दिया कि मार्च के पहले हफ्ते में चुनाव आयोग वहां चुनाव तारीखों की घोषणा कर सकता है। बहरहाल, असम के साथ ही पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भी चुनाव होने वाले हैं और इनकी धमक काफी पहले से सुनाई दे रही है। वह दौर बीत गया जब दक्षिण या उत्तर-पूर्व के राज्यों के चुनावों पर राष्ट्रीय मीडिया में जरूरत भर को ही चर्चा होती थी। अभी कोई चुनाव छोटा या गैरमामूली नहीं होता। हैदराबाद के नगरपालिका चुनावों पर भी हफ्तों चहल-पहल हमने हाल में देखी है। लोकतंत्र के लिए निश्चित रूप से यह एक अच्छी बात है, हालांकि देश को हमेशा इलेक्शन मोड में न रखने के सरकार प्रायोजित विमर्श को देखते हुए यह थोड़ी अटपटी भी लगती है। इस सदाबहार चुनावी गहमागहमी की अगुआई बीजेपी कर रही है। उसी ने इसको शुरू किया और वही आगे भी बढ़ा रही है।

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इस बार चुनाव तो पांच विधानसभाओं के होने वाले हैं लेकिन खबरें दो राज्यों से ज्यादा आ रही हैं। असम, जहां बीजेपी सत्ता में है और पश्चिम बंगाल, जहां वह पहली बार सत्ता की दौड़ में शामिल है। केरल में वाम मोर्चे की सरकार को चुनौती कांग्रेस की तरफ से है जबकि तमिलनाडु में मुख्य लड़ाई एआईएडीएमके और डीएमके के बीच है। पुडुचेरी में बीजेपी का कोई निर्वाचित विधायक नहीं है लेकिन तीन मनोनीत विधायकों के जरिये वहां विधानसभा में उसकी उपस्थिति बनी हुई है। केरल में मेट्रोमैन ई श्रीधरन के बीजेपी जॉइन करने और पुडुचेरी में छह विधायकों के इस्तीफे के कारण नारायण सामी सरकार गिरने के बाद कहा जाने लगा है कि इन राज्यों के चुनाव में भी बीजेपी का दखल हाशिये तक सीमित नहीं रहेगा। एक कमाल की बात इधर यह हुई है कि ‘प्यार और जंग में सब जायज है’, वाले सूत्रवाक्य में चुनाव तीसरी सिचुएशन बन गया है। इसका ताजा उदाहरण मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के घर पर सीबीआई टीम का पहुंचना है। घोटाले के हर आरोप की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए, लेकिन जांच एजेंसियों की इस तेजी को चुनावों से जोड़कर देखने के लिए किसी अतिरिक्त प्रयास की जरूरत नहीं है।

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इसमें कोई शक नहीं कि बीजेपी की अगुआई में चुनावी मुकाबलों का रोमांच वोटिंग और उसके नतीजों की घोषणा तक सीमित नहीं रह गया है। कई राज्यों में बहुमत से काफी कम विधायक लाकर भी उसने सरकार बनाई है तो कुछ में सत्तारूढ़ विधायकों के इस्तीफे के बाद घुमा-फिराकर यह कार्य संपन्न किया है। इससे बाकी पार्टियों के लिए टास्क तय हो गया है कि उन्हें जीतना है तो भारी बहुमत लाकर जीतें और एक-एक विधायक ठोका-बजाया हुआ लेकर आएं। झरोखा दर्शन देकर लड़ी जाने वाली गुडी-गुडी चुनावी लड़ाइयों के लिए देश में अब कोई जगह नहीं बची है।

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