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ग्रीनकार्ड की गुंजाइश

बाइडन प्रशासन की ओर से पिछले हफ्ते अमेरिकी संसद में पेश किया गया नागरिकता बिल 2021 इस बात की एक और स्पष्ट घोषणा है कि अमेरिका संकीर्णता को बाय-बाय बोलकर उदारता और खुलेपन की राह पर बढ़ चला है। यह विधेयक न केवल एच 1-बी वीजा धारी भारतीयों के हक में है बल्कि वहां अवैध तौर पर रह रहे लाखों प्रवासियों को नई उम्मीद दिलाता है। विधेयक के मुताबिक इन अवैध प्रवासियों को वहां अस्थायी हैसियत से पांच साल बिताने के बाद ग्रीनकार्ड के योग्य मान लिया जाएगा और पुलिस जांच वगैरह से निकलने तथा नियमित टैक्स भरने पर तीन साल बाद वे नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे। माना जा रहा है कि यह बिल ज्यों का त्यों पास हो गया तो एक करोड़ से ज्यादा प्रवासियों के लिए अमेरिकी नागरिकता की राह खुल जाएगी। हालांकि फिलहाल ऐसा हो पाना मुश्किल माना जा रहा है क्योंकि सीनेट में डेमोक्रैट्स के पास आवश्यक बहुमत नहीं है। लेकिन बाइडन प्रशासन इसे लेकर काफी गंभीर है और विधेयक में कुछ संशोधनों पर खुले मन से विचार करने की तैयारी भी दिखा रहा है। ऐसे में अगले कुछ हफ्तों में साफ होगा कि अंततः किन संशोधनों के साथ विधेयक के कितने प्रावधानों को मंजूरी मिलती है।

अलबत्ता इतना तय है कि यह बिल संसद के अंदर ही नहीं, अमेरिकी समाज में भी तीखी बहस का कारण बनेगा। पिछले कुछ वर्षों में बेरोजगारी जैसे सवालों को लेकर अमेरिका का एक श्वेत श्रमजीवी तबका काफी मुखर रहा है। उसकी शिकायत रही है कि प्रवासियों को तरजीह देने वाली नीतियों का खामियाजा उसे भुगतना पड़ता है। ट्रंप के शासनकाल में वीजा से जुड़े कुछ फैसले इस तबके को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में ही देखे गए थे। बहुत संभव है कि निम्न मध्यमवर्ग का यह हिस्सा इस विधेयक को भी अपने हितों पर हमले के रूप में देखे। मगर इससे अलग एक बड़ी सचाई यह है कि अमेरिकी समाज प्रवासियों के बगैर आगे नहीं बढ़ सकता। उसे न केवल रोज के छोटे-मोटे और हीन समझे जाने वाले कार्यों के लिए बल्कि विज्ञान और तकनीक में आगे रहने के लिए भी प्रवासियों की जरूरत है। दुनिया भर से आने वाले स्किल्ड प्रफेशनल और टैलंटेड रिसर्चर विभिन्न क्षेत्रों में उसका अग्रणी बने रहना मुमकिन बनाते हैं। इस अर्थ में देखें तो अपनी भौगोलिक सीमाओं में बंधे रहने की संकीर्णता आज दुनिया के हर समाज के आगे बढ़ने की राह में बाधा ही खड़ी करती है। अगर समाज का कोई हिस्सा असुरक्षित महसूस करता है तो जरूरत उसकी उस असुरक्षा को दूर करने की है, न कि इसे भुनाते हुए उसके अनुरूप नीतियां बनाने की। नागरिकता विधेयक पेश करके बाइडन प्रशासन ने नीतियों की दिशा सही करने का संकेत तो दे दिया है। देखने की बात यह होगी कि स्वस्थ बहस के जरिए इन नीतियों को सर्वस्वीकार्य बनाने का मकसद वह किस तरह से और किस हद तक हासिल कर पाता है।

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