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भारत-चीनः आखिर बनी सहमति

महीनों चले गतिरोध के बाद आखिर भारत-चीन सीमा पर आमने-सामने तैनात सैनिकों को पीछे हटाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को राज्यसभा में दोनों पक्षों के बीच इस बारे में बनी सहमति की घोषणा की। बीते जून में गलवान घाटी में हुई भिड़ंत के बाद से दोनों देशों के आपसी रिश्तों में जिस तरह का संदेह और अविश्वास घर कर गया है, उसके दूर होने में तो समय लगेगा लेकिन पैंगोंग झील के पास से दोनों सेनाओं का अपने-अपने स्थान से पीछे हटना यकीनन एक अच्छी शुरुआत है। खासकर इसलिए भी कि जैसा रक्षामंत्री ने संसद में बताया, सहमति अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति में वापस जाने को लेकर बनी है। पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे पर चीनी सैनिक फिंगर 8 के पास रहेंगे और भारतीय सैनिक फिंगर 3 के पास। अप्रैल से पहले तक भारतीय टुकड़ियां फिंगर 8 तक गश्त लगाती थीं, लेकिन अभी फिंगर 3 से 8 के बीच गश्त लगाने पर अस्थायी रोक रहेगी। तनाव के दौरान इस क्षेत्र में जो निर्माण किए गए हैं, उन्हें हटाए जाने की बात भी खासी महत्वपूर्ण है।

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हालांकि इस पहलू को भी ध्यान में रखना जरूरी है कि यह समझौता सिर्फ एक विवादित क्षेत्र को लेकर हुआ है। उत्तर में डेपसॉन्ग मैदान और दक्षिण में गलवान घाटी समेत विवाद के बाकी बिंदुओं पर फिलहाल कोई सहमति नहीं बनी है। राजनाथ सिंह ने भी अपने बयान में इस तरफ इशारा करते हुए कहा है कि विवाद के कई बिंदु अभी पेंडिंग हैं। फिर भी जितनी सहमति बनी है उसकी अहमियत कई बिंदुओं पर विवाद बचे रह जाने के कारण कम नहीं हो जाती। इससे यह उम्मीद तो जगी है कि दोनों पक्ष थोड़ी समझदारी दिखाएं तो विवादों के बीच भी तनाव कम करने की राह निकाली जा सकती है। सेनाओं के पीछे हटने की शुरुआत इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इससे सीमा पर कभी भी कुछ भी हो जाने का डर कम होता है, खजाने पर पड़ने वाला अनावश्यक बोझ घटता है और एक साथ दो-दो सीमाओं पर युद्ध की आशंका के बीच जीने की मजबूरी खत्म होती है।

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दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को स्थायी तौर पर हल करने का लक्ष्य काफी दूर है, लेकिन अगर परस्पर विश्वास के साथ एक-दूसरे के दावों और वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करते हुए बातचीत जारी रखें तो सहयोगपूर्ण रिश्ते उसी तरह जारी रह सकते हैं, जैसे पिछले तीन दशकों से बने हुए थे। चीन की हालिया हरकतों से आपसी विश्वास की बुनियाद में दरार पड़ गई है लेकिन कोशिश की जाए तो यहां से भी हालात संभाले जा सकते हैं। पैगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारों को लेकर बनी इस सहमति पर सही ढंग से अमल सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि यह अन्य क्षेत्रों में भी सहमति कायम करने का आधार बन सके।

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