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इस बार चमोली

उत्तराखंड के चमोली जिले में रविवार को हुए हादसे ने एक बार फिर सबको दहला दिया। 2013 का केदारनाथ हादसा अभी हमारी सामूहिक याददाश्त में धूमिल भी नहीं पड़ा है कि यह एक और घटना हो गई। हालांकि केदारनाथ हादसा आकार-प्रकार और भीषणता के मामले में इससे कहीं बड़ा था, लेकिन इस दुर्घटना ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि हिमालय के संवेदनशील इलाकों के घटनाक्रम को लेकर हम किस कदर अनजान, बल्कि उदासीन बने हुए हैं और इसके कितने खतरनाक नतीजे हमें भुगतने पड़ सकते हैं। अभी तक पुख्ता तौर पर यह भी स्पष्ट नहीं हो सका है कि रविवार सुबह हुए इस हादसे के पीछे आखिर वजह क्या थी।

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कहा जा रहा है कि यह ऊपरी क्षेत्र में आए एक ऐवलांच (हिमस्खलन) का परिणाम हो सकता है। दूसरी संभावना ग्लेशियर टूटने की बताई जा रही है। मगर दोनों ही स्थितियां अपने आप में इतनी तेजी से पानी नीचे आने का कारण नहीं बन सकतीं। जमी हुई बर्फ दरक कर अच्छी-खासी ठंड में आखिर इतनी जल्दी पिघल कैसे जाएगी? इस तरह के फ्लैश फ्लड का मतलब ही है कि पानी ऊपर कहीं इकट्ठा हुआ होगा, कोई अस्थायी झील बनी होगी। ऐवलांच आने या ग्लेशियर टूटने की वजह से इस झील के रुके हुए पानी को नीचे की ओर रास्ता भर मिल गया होगा जिसने कहर ढा दिया। लेकिन हादसे के पहले ऐसी कोई झील बनने की तो कोई जानकारी ही नहीं थी। हादसे के बाद भी ऐसा कोई संकेत अभी तक नहीं मिल पाया है। इससे पता चलता है कि हिमालयी क्षेत्र में हो रही उथल-पुथल पर नजर रखने की व्यवस्था कितनी अपर्याप्त है।

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ध्यान रहे, इस क्षेत्र में आपदा प्रबंधन की व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत लगातार बताई जाती रही है। यहां वॉर्निंग सिस्टम लगाने को लेकर 2014 में दायर एक जनहित याचिका पर 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट का आदेश भी आ चुका है। इसके बावजूद इस मोर्चे पर कुछ ठोस नहीं किया जा सका। मामले का दूसरा पहलू है हिमालय के साथ अपनी तरफ से की जाने वाली छेड़छाड़ का। एक तो नया होने की वजह से वैसे भी हिमालय दुनिया का सबसे कच्चा पहाड़ माना जाता है। दूसरे, ग्लोबल वार्मिंग जैसे कारकों ने दुनिया भर में बाहर से ठोस और बेहद मजबूत दिखने वाली प्राकृतिक संरचनाओं को अंदर-अंदर कमजोर करने का काम किया है। ऐसे में हमारे सामने यह समझने का कोई जरिया नहीं है कि हजारों वर्षों से ठोस रूप में मौजूद कोई ढांचा दरअसल कितना मजबूत है। तमाम हिमालयी जल विद्युत परियोजनाएं इन ढांचों की मजबूती को लेकर आम समझ पर आधारित हैं, हालांकि यह समझ आजकल अक्सर गलत साबित होने लगी है। ऐसे में जरूरी है कि हिमालयी क्षेत्रों में खुदाई, तोड़-फोड़ और निर्माण संबंधी गतिविधियों पर विज्ञान और विवेक का अंकुश मजबूत किया जाए, साथ ही वहां की कुदरती हलचलों पर नजर रखने की बेहतर व्यवस्था की जाए।

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