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हाइड्रोजन इकॉनमी

नई दिल्ली
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल में पेश बजट में हाइड्रोजन इकॉनमी पर खासा ध्यान दिया है। इस संबंध में उन्होंने न केवल ग्रीन हाइड्रोजन पर काम करने के लिए गठित नैशनल हाइड्रोजन एनर्जी मिशन का जिक्र किया, बल्कि इस मद में ढाई हजार करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया है। हाइड्रोजन इकॉनमी आने वाले दौर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में उभर रही है।

इसका मतलब ऐसी अर्थव्यवस्था से है जो पेट्रोल, डीजल और प्राकृतिक गैस जैसे प्रदूषणकारी ईंधनों के बजाय हाइड्रोजन जैसे जीरो पल्यूशन फ्यूल पर चलती हो। वैसे तो इस पर काम काफी पहले से चल रहा है, पर दो-तीन ऐसी दिक्कतें अभी कायम हैं जिनकी वजह से हाइड्रोजन को व्यावहारिक विकल्प के रूप में स्वीकार करना संभव नहीं हो पा रहा। पहली दिक्कत सुरक्षा की है। अत्यधिक ज्वलनशील होने की वजह से हाइड्रोजन अपने साथ हमेशा ‘अत्यधिक खतरनाक’ का टैग लिए चलती है। इससे चलने वाले किसी भी वाहन को सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

ज्वलनशीलता और बहुत कम ताप पर रखे जाने की मजबूरी के चलते इसकी सेफ सप्लाई और भंडारण आज भी एक मुश्किल काम बना हुआ है। इसके अलावा उत्पादन लागत का सवाल भी है। पेट्रो पदार्थों की तुलना में हाइड्रोजन की प्रॉडक्शन कास्ट भी अभी काफी ज्यादा है। इन परेशानियों के बावजूद वैज्ञानिक लगातार लगे हुए हैं और नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। ताजा मामला चीन और ऑस्ट्रेलिया की एक रिसर्च टीम का है जिसने एक नए कैटलिस्ट के जरिए सोलर एनर्जी का इस्तेमाल करके समुद्री जल से हाइड्रोजन बनाकर दिखाया है। खर्चे और हाइड्रोजन की क्वांटिटी, दोनों ही लिहाज से इसको अब तक का सबसे अच्छा तरीका माना जा रहा है। हालांकि समुद्री पानी से हाइड्रोजन बनाने का काम कोई पहली बार नहीं हुआ नहीं है।

दो साल पहले की एक स्टडी में तब तक की खोजों के आधार पर अनुमान लगाया गया था कि दुनिया की तात्कालिक तेल जरूरतें पूरी करने भर की हाइड्रोजन पैदा करने के लिए सोलर फ्यूल रिग्स को 63,000 वर्ग मील (लगभग बिहार जितना) समुद्री क्षेत्र कवर करना होगा। बहरहाल, ग्रीन एनर्जी को लेकर ग्लोबल आग्रह कितना ज्यादा है, इसका अंदाजा आला अमेरिकी कार कंपनी जनरल मोटर्स की इस घोषणा से लगाया जा सकता है कि 2035 तक वह पेट्रो पदार्थों से चलने वाली गाड़ियों का उत्पादन पूरी तरह बंद कर देगी। जाहिर है, भारतीय वैज्ञानिकों के सामने कोई ऐसी राह निकालने की चुनौती है जिससे इस युगांतरकारी तकनीकी बदलाव में हम आत्मनिर्भर रह सकें। यह तभी होगा जब अपने प्रयासों का दायरा हम बजट में निर्धारित छोटी-सी राशि के आधार पर न तय करें, बल्कि अपने प्रयासों से यह सुनिश्चित करें कि बड़ी जरूरतों को देखते हुए उनके आधार पर बजट राशि आवंटित की जाने लगे।

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