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कैसे कम हो तनाव

आर्मी चीफ जनरल एमएम नरवणे ने मंगलवार को सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ-साफ कहा कि हमें एक साथ दो मोर्चों पर खतरे का सामना करने के लिए खुद को तैयार रखना होगा। वास्तव में हमारी सेना पिछले कुछ समय से दोहरी चुनौती का मुकाबला कर रही है। एक तरफ पाकिस्तान से लगी एलओसी पर गोलीबारी और आतंकी घुसपैठ की कोशिशें जारी हैं, दूसरी तरफ चीन से लगी एलएसी पर भी हालात सामान्य होने की कोई संभावना नहीं दिख रही। हालांकि सेना के जवान दोनों मोर्चों पर लगातार चुस्ती बनाए हुए हैं और इसके लिए निश्चित रूप से वे तारीफ के हकदार हैं, मगर सीमा पर, खासकर दो-दो सीमाओं पर एक साथ लंबे समय तक तनाव के हालात बने रहना कोई सामान्य बात नहीं है।

यह जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की है कि सीधी बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए सीमा पर शांति और न्यूनतम भरोसे की स्थिति बहाल करे। दुर्भाग्यवश चीन और पाकिस्तान, दोनों ही मामलों में फलदायी कूटनीतिक संवाद की कोई प्रक्रिया नजर नहीं आ रही। हालांकि भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी बात सशक्त ढंग से रखने में कोई कोताही नहीं बरती है। बीते मंगलवार को विदेश मंत्री जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक मंत्रिस्तरीय बैठक में आतंकवाद के सवाल पर चीन और पाकिस्तान दोनों को आईना दिखाया। अंतरराष्ट्रीय मंचों से ऐसी घेरेबंदी हमेशा उपयोगी होती है। लेकिन इसका असल फायदा तभी होता है जब इससे बनने वाले दबाव का इस्तेमाल द्विपक्षीय बातचीत में किया जा सके।

पाकिस्तान के मामले में पिछले कुछ वर्षों का हमारा अनुभव देखा जाए तो उसकी घेरेबंदी करने में हम काफी हद तक सफल रहे हैं। लेकिन उसकी कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर उससे अपनी कोई बात नहीं मनवा पाए हैं। चीन के मामले में अच्छी बात यह है कि न केवल उससे बातचीत के सारे चैनल खुले हैं बल्कि व्यापारिक गतिविधियां भी लगभग पहले जैसी ही चल रही हैं। मगर वहां भी इन प्रक्रियाओं का कोई उपयोग सीमा पर तनाव कम करने में नहीं हो पा रहा है। वैसे चीन के साथ तनाव का भारत समेत पूरी दुनिया को यह फायदा जरूर हुआ है कि ताकत के बल पर किसी को भी झुका ले जाने वाली चीन की दबंग छवि इससे मटियामेट हो गई है।

मगर भारतीय सेना की इस उपलब्धि के बाद आगे की भूमिका निभाने के लिए कूटनीति को ही सामने आना होगा। हमें इस पहलू पर भी विचार करना चाहिए कि इस तनाव का उपयोग पाकिस्तान ने चीन से अपनी सामरिक घनिष्ठता बढ़ाने में किया है, जबकि चीन सीमावर्ती क्षेत्रों में अपना रेलवे और डिफेंस इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में जुटा है। उनके बरक्स हमें अपने संसाधन सिर्फ दोनों मोर्चों पर यथास्थिति बनाए रखने में खपाने पड़ रहे हैं। जाहिर है, भारत के लिए आगे की चुनौती यही है कि हम अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता किए बगैर सीमा पर तनाव कम करने की राह जल्द से जल्द खोज निकालें।

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