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सीमा सुरक्षा का सवाल

भारत-चीन सीमा पर पिछले सात महीनों से जारी तनाव के बीच चीन द्वारा यारलुंग त्सांगपो नदी पर विशाल बांध बनाने की घोषणा ने दोनों पक्षों के लिए टकराव का एक और मोर्चा खोल दिया है। यह नदी तिब्बत से भारतीय सीमा में आने के बाद ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है। पूरे उत्तर-पूर्वी भारत की जीवन रेखा ब्रह्मपुत्र पर भारतीय सीमा के बहुत करीब 60 हजार मेगावॉट क्षमता वाला जलविद्युत संयंत्र बनाने की चीनी योजना स्वाभाविक ही भारत को चौंकाने वाली है। बांध के संभावित दुष्परिणामों को काबू में रखने के लिए भारत ने भी सीमा के इस तरफ 10 हजार मेगावॉट बिजली पैदा कर सकने वाला एक जलाशय और बांध बनाने का इरादा जताया है ताकि सीमा के उस तरफ से अचानक पानी छोड़े जाने की स्थिति में हमारे इलाके डूबने न लग जाएं।

भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील माने जाने वाले इस इलाके में दो बड़े बांधों से जुड़े खतरों ने विशेषज्ञों को चिंतित कर दिया है। कहा जा रहा है कि इसके साइड इफेक्ट सिर्फ भारत और चीन तक सीमित नहीं रहेंगे। वे आसपास के देशों को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं। लिहाजा बांग्लादेश ने ठीक ही मांग की है कि बांध बनाने की योजना पर आगे बढ़ने से पहले सभी संबंधित देशों को विश्वास में लिया जाए। बहरहाल, सीमा पर चीन की विस्तारवादी नीतियों से प्रेरित गतिविधियों का यह इकलौता उदाहरण नहीं है। हाल की सैटलाइट तस्वीरें बताती हैं कि भारत और भूटान से लगी अपनी सीमा पर नए-नए गांव बसाने में भी चीन पूरी शिद्दत से जुटा है। पिछले नौ महीने में ही बुमला दर्रे से पांच किलोमीटर के अंदर कम से कम तीन नए गांव बसा लिए गए हैं। एक सप्ताह पहले ऐसी ही तस्वीरों से भूटान के डोकलाम के पास भी चीन द्वारा गांव बसाए जाने की बात सामने आई थी। चाहे यारलुंग त्सांगपो पर बांध बनाने का मामला हो या सीमा पर नए गांव बसाने का, चीन के इन कदमों को टुकड़ों में देखना सही नहीं होगा। यह उसकी सुविचारित और दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। काफी पहले से वह सीमावर्ती क्षेत्रों में इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने, बड़े शहर और औद्योगिक केंद्र बसाने में लगा है।

इसी का नतीजा है कि सीमा पर बसाए जा रहे इन नए गांवों तक जरूरी सुविधाएं पहुंचाना और वहां की आबादी को चीन की मुख्यधारा से जोड़े रहना ज्यादा मुश्किल नहीं है। इस संदर्भ में अपने देश के सीमावर्ती इलाकों पर नजर डालें तो वे न केवल मुख्यधारा से कटे जान पड़ते हैं बल्कि अवसरों की कमी और दोनों तरफ की फौजी गतिविधियों से उपजे खतरों के चलते वहां के लोग लगातार महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। याद रहे, सीमा की वास्तविक सुरक्षा फौजों से नहीं, वहां रह रही आबादी से होती है। इसलिए बॉर्डर के किसानों और चरवाहों का इत्मीनान और उनकी खुशहाली हमारी रक्षा नीति का अभिन्न अंग होनी चाहिए।

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