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आस बंधाते आंकड़े, कम हुई जीडीपी की गिरावट

मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही के भी जीडीपी आंकड़े नेगेटिव में होने और इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था के मंदी से गुजरने की औपचारिक पुष्टि हो जाने के बावजूद सरकार और अर्थशास्त्रिों की प्रतिक्रिया चिंता के बजाय राहत की है। इसका कारण यही है कि जुलाई से सितंबर की तिमाही में हालात जितने बुरे होने संभावित थे, उससे कम बुरे निकले। अप्रैल से जून वाली तिमाही में 23.9 फीसदी की ऐतिहासिक गिरावट देखने के बाद इस बार के लिए विशेषज्ञ जीडीपी में 7.9 से लेकर 8.8 फीसदी तक की गिरावट के अनुमान लगा रहे थे। खुद रिजर्व बैंक का मानना था कि गिरावट 8.6 फीसदी रहेगी। ऐसे में जब शुक्रवार को जारी आंकड़ों से पता चला कि वास्तविक गिरावट महज 7.5 फीसदी दर्ज हुई है तो इस पर थोड़ी खुशी स्वाभाविक है।

ध्यान रहे, वित्त वर्ष की इस दूसरी तिमाही का एक बड़ा हिस्सा लॉकडाउन के प्रभाव में गुजरा था। तकनीकी तौर पर वह लॉकडाउन के खुलने का, यानी अनलॉक का दौर था, लेकिन आर्थिक गतिविधियां धीरे-धीरे ही शुरू हो पाईं। इस लिहाज से देखा जाए तो इसे काफी तेज रिकवरी कहा जाएगा। हां, इसके आधार पर अगर कोई अगली तिमाहियों में विकास दर के चौकड़ी भरने की उम्मीद पाल ले तो उसकी व्यावहारिकता संदिग्ध होगी। ब्यौरे में जाएं तो इस तिमाही में अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा मजबूती कृषि, वानिकी और मत्स्य उत्पादन के क्षेत्रों से ही मिली है। प्राइमरी सेक्टर में रखे जाने वाले इन उद्यमों ने पहली तिमाही की ही तरह इस बार भी 3.4 फीसदी बढ़ोतरी की स्थिर दर बरकरार रखी।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 0.6 फीसदी की बढ़ोतरी को उत्साहवर्धक कहा जाएगा, क्योंकि पहली तिमाही में इस क्षेत्र में 39.3 फीसदी की भीषण गिरावट आई थी। यह इस बात का संकेत है कि लॉकडाउन के लंबे गैप के बाद फैक्ट्रियों में थोड़ा-बहुत उत्पादन शुरू हुआ और उनसे जुड़े लाखों लोगों की रोजी-रोटी का इंतजाम हुआ। इनके अलावा लगभग सारे ही क्षेत्रों में पहली तिमाही के मुकाबले कम, लेकिन गिरावट ही दर्ज हुई। ऐसे में रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने बिल्कुल सही कहा कि इस मोड़ पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जो मांग पैदा हुई दिख रही है, वह टिकी रहेगी या नहीं।

इस बिंदु पर दो-तीन ऐसे कारक मिलते हैं जो भविष्य को लेकर ज्यादा खुश होने की गुंजाइश नहीं छोड़ते। एक तो यह कि पिछली तिमाही देश के त्योहारी सीजन से ठीक पहले की थी। उस दौरान विभिन्न उपभोक्ता सामानों का जो उत्पादन हुआ, उसके पीछे यह उम्मीद थी कि त्योहारों के दौरान वे बाजार में खप जाएंगे। यह कितना हो पाया, इसका हिसाब बाद में होगा लेकिन एक बात तय है कि तीसरी-चौथी तिमाहियों में फेस्टिव सीजन जितने बड़े पैमाने के उत्पादन का जोखिम कोई उद्यमी नहीं उठाता। सरकार ने दूसरी तिमाही में जितनी उदारता से उद्यमियों की मदद की, उसमें भी समय के साथ कटौती होना तय है। तीसरा और सबसे बड़ा कारक है कोरोना का असर। बीमारी की जिस नई लहर का खतरा देश के कई हिस्सों में दिख रहा है और विदेशों में जिसका असर भारतीय निर्यात को उठने नहीं दे रहा है, वह टीके की चर्चा पर भारी पड़ सकती है। बहरहाल, इन आशंकाओं के बीच अगर हमने अपनी फैक्ट्रियों पर दोबारा ताला पड़ने की नौबत न आने दी और नौकरी छूटने का जो डर लोगों के मन में बैठ गया है, उसे घटाने में कामयाब रहे तो धीरे-धीरे बेहतरी की ओर बढ़ा जा सकता है।

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