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इस रात की सुबहः कोरोना का टीका बनने से चौतरफा उत्साह

इस लंबी, अंतहीन सी लग रही सुरंग के अंत में आखिर रोशनी की किरण दिखाई देने लगी है। कोरोना महामारी से लड़ती दुनिया को अंदाजा ही नहीं मिल रहा था कि यह लड़ाई कब तक चलेगी। जिन देशों ने मुश्किल से नए मामलों और मृतकों की संख्या नियंत्रित करने में सफलता पाई, वहां भी दूसरी और फिर तीसरी लहर ने पूरी दुनिया की पेशानी पर बल ला दिए थे। मगर इधर हफ्ते भर के घटनाक्रम ने नया उत्साह जगाने का काम किया है। इस उत्साह का सबसे बड़ा स्रोत है यह समाचार कि कोरोना वायरस का अपेक्षा से अधिक क्षमता वाला टीका बनाने में कामयाबी मिल गई है।

दो अमेरिकी फार्मा कंपनियों फाइजर और मॉडर्ना ने 95 फीसदी क्षमता वाला टीका विकसित कर लिया है। हालांकि भारत के लिए इन कंपनियों के टीके का ज्यादा उपयोग फिलहाल नहीं दिखता क्योंकि एक तो इन कंपनियों के साथ भारत का करार नहीं है, दूसरे ये टीके महंगे पड़ रहे हैं और तीसरे इनका भंडारण और वितरण भी खासा मुश्किल है। इन्हें -70 से -80 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखना जरूरी है जो भारत में हर जगह उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।

लेकिन भारत में एसआईआई (सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) के पास ऑक्सफर्ड-आस्ट्रेजेनेका का लाइसेंस है, जिसकी वैक्सीन पर भी काम काफी आगे बढ़ गया है। एसआईआई भारत और अन्य निम्न तथा मध्यम आय वाले देशों के लिए टीके की सौ करोड़ डोज का उत्पादन करने वाली है। कहा जा रहा है कि स्वास्थ्यकर्मियों और बुजुर्गों को जनवरी से और आम लोगों को अप्रैल-मई से टीके लगने शुरू हो जाएंगे। टीकाकरण के लंबे अनुभव और इसके बने-बनाए ढांचे को देखते हुए बड़े पैमाने पर लोगों को टीका लगाना हमारे लिए ज्यादा मुश्किल नहीं होना चाहिए। महामारी पर जल्दी काबू पाने की इस उम्मीद ने दुनिया भर में स्वाभाविक ही खुशी की लहर फैला दी है।

इसका असर भारत के शेयर बाजारों पर भी दिख रहा है जिन्होंने इसी बीच ऊंचाई का नया कीर्तिमान बना दिया। बहरहाल, खुशी की रौ में बहते हुए हमें ठोस हकीकतों से भी मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। सचाई यही है कि न केवल अगले छह-आठ महीने बल्कि टीकाकरण की मुहिम चल पड़ने के बाद भी काफी समय तक आबादी के बड़े हिस्से को संयम और सतर्कता के ही भरोसे रहना है। एक बड़ा सवाल टीकों पर आने वाले खर्च का भी है।

हालांकि अन्य देशों के मुकाबले भारत में इसकी कीमत काफी कम पड़ेगी, फिर भी 500-600 रुपये प्रति डोज का खर्च आम भारतीय परिवार के लिए भारी पड़ेगा। दूसरी बात यह कि अगर अत्यंत गरीब परिवार भी इस दायरे से बाहर रह गए तो टीकाकरण की पूरी मुहिम कुछ समय में निरर्थक साबित हो सकती है। इसलिए सरकार को अभी से इसके लिए कमर कस लेनी चाहिए कि यह टीका सरकारी पहल पर हर भारतीय को मुफ्त में लगाया जाए।

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