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प्यार पर पाबंदी

कर्नाटक और हरियाणा के बाद अब मध्य प्रदेश सरकार ने भी ‘’ के खिलाफ नया कानून लाने की घोषणा कर दी है। मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का कहना है कि विधानसभा के अगले ही सत्र में यह विधेयक पेश कर दिया जाएगा। साफ है कि बीजेपी शासित इन राज्यों की सरकारें ‘लव जिहाद’ नाम की उस समस्या को बड़ी गंभीरता से ले रही हैं, जिसका केंद्र सरकार के मुताबिक कोई अस्तित्व ही नहीं है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसी साल फरवरी में संसद को सूचित किया था कि न तो किसी कानून में लव जिहाद जैसी किसी चीज का जिक्र है, न ही किसी जांच एजेंसी को अब तक ऐसा कोई केस मिला है। बावजूद इसके, न केवल विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठन बल्कि राज्य सरकारों से जुड़े लोग भी कथित लव जिहाद को लेकर आक्रामक बयान देते रहते हैं। अभी तो बीजेपी की राज्य सरकारों में इसके खिलाफ कानून लाने की होड़ मची हुई है।

‘लव जिहाद’ शब्द हाल के वर्षों में ज्यादा चलन में आया है और इसका प्रयोग हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के की शादी के संदर्भ में किया जाता है। आरोप यह है कि ऐसे ज्यादातर मामलों में लड़की को बहला-फुसला कर या उसका ब्रेनवॉश करके उसका धर्म बदलने की साजिश होती है। मध्य प्रदेश के गृहमंत्री के मुताबिक प्रस्तावित कानून में इसके लिए पांच साल के सश्रम कारावास का प्रावधान होगा और इसे गैर जमानती अपराध बनाया जाएगा। इतना ही नहीं, इसमें मदद करने वाले लोगों को मुख्य आरोपियों के समकक्ष माना जाएगा। हालांकि कानून या विधेयक का स्वरूप तो ठीक-ठीक तब स्पष्ट होगा जब यह तैयार होगा, लेकिन फिलहाल राहत की बात यह है कि मध्य प्रदेश सरकार ने अंतरधार्मिक जेनुइन शादियों की भी गुंजाइश मानी है।

कहा जा रहा है कि शादी के लिए स्वैच्छिक धर्मांतरण के मामलों में एक महीना पहले जिलाधिकारी कार्यालय में आवेदन करना होगा। मगर सबसे बड़ा सवाल यहां यह है कि आखिर यह पता कैसे लगाया जाएगा कि धर्मांतरण स्वैच्छिक है या संबंधित व्यक्ति को बहलाया-फुसलाया गया है, उसका ब्रेनवॉश किया गया है। जाहिर है, इसका एकमात्र प्रामाणिक आधार संबंधित व्यक्ति का अपना बयान ही हो सकता है। अगर सचमुच किसी को बहलाया-फुसलाया जाता है तो देर-सबेर उसे इसका अहसास भी होगा और फिर वह इसकी शिकायत भी संबंधित अधिकारियों से कर सकता/सकती है।

चूंकि विवाहित महिलाओं और पुरुषों को यह अधिकार मौजूदा कानूनों के तहत भी हासिल है, इसलिए इस पर अलग से कानून लाने का कोई औचित्य नहीं बनता। वैसे भी देश में स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 पहले से ही मौजूद है जो अंतरधार्मिक विवाहों के मामलों में लागू होता है। नए कानून से अगर कुछ होगा तो यही कि देश के युवाओं के अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और अपने विश्वास के मुताबिक अपना धर्म चुनने के अधिकार पर पाबंदियां लगेंगी। व्यक्ति स्वातंत्र्य के प्रति ऐसा जोर-जबर्दस्ती वाला नजरिया किसी आधुनिक समाज को शोभा नहीं देता।

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