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US Election: बहस और उसके बाद

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में दोनों प्रत्याशियों के बीच टीवी डिबेट का सिलसिला खत्म हो जाने के बाद मुकाबला अंतिम चरण में पहुंच चुका है। अगले सप्ताह के मंगलवार यानी 3 नवंबर को वोट पड़ने वाले हैं। दोनों प्रत्याशियों के बीच होने वाली टीवी डिबेट्स अमेरिकी मतदाताओं का मूड तय करने के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण मानी जाती रही हैं। इस बार राष्ट्रपति ट्रंप के कोरोना संक्रमित हो जाने के कारण डिबेट का एक राउंड नहीं हो सका। जो दो राउंड हुए उनमें पहला खासा तनावपूर्ण और बकझक वाला रहा। दूसरा और आखिरी राउंड काफी हद तक शांत माना गया, जिसका अर्थ यह लगाया जा रहा है कि इससे मतदाताओं की मनःस्थिति पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ने वाला।

अब तक के सर्वेक्षण ट्रंप को बाइडन से काफी पीछे बता रहे हैं, मगर याद रखना जरूरी है कि अमेरिकी चुनाव प्रक्रिया खासी जटिल है। इसमें वोटर सीधे तौर पर प्रत्याशी को वोट नहीं देते। अपने वोट से वे इलेक्टोरल कॉलेज को चुनते हैं, जिनकी संख्या हर राज्य में अलग-अलग होती है और कुछ राज्यों में एक भी वोट ज्यादा पाने वाले प्रत्याशी को उस राज्य के इलेक्टोरल कॉलेज के सारे वोट मिल जाते हैं। ऐसे में आम मतदाताओं के बीच दिख रही भावनाओं के आधार पर प्रत्याशियों की जीत-हार का अनुमान लगाना हमेशा रिस्की होता है। पिछले, यानी 2016 के चुनावों में हिलैरी क्लिंटन अधिक वोट पाकर भी चुनाव हार गईं। उन्हें आम वोटरों का ज्यादा समर्थन मिला, लेकिन इलेक्टोरल कॉलेज के वोटों में ट्रंप बाजी मार ले गए ।

बहरहाल, ट्रंप और बाइडन की जद्दोजहद अभी जारी है। अलबत्ता इस बीच वोटिंग भी चालू है और 5 करोड़ से ऊपर मतदाता वोट डाल चुके हैं। वजह यह कि कोरोना से जुड़े हालात को देखते हुए इस बार अर्ली वोटिंग की पात्रता में कुछ ढील दी गई है। इसका फायदा उठाकर लोग बड़ी संख्या में अभी से वोट डाल रहे हैं । इसे इस बात का संकेत माना जा रहा है कि कोरोना जैसी भीषण महामारी के हालात भी वोटरों का उत्साह कम नहीं कर पाए हैं। जो दूसरा कारक इन चुनावों को यादगार बना रहा है, वह है ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन। इस चुनावी वर्ष में एक अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की श्वेत पुलिसकर्मी द्वारा दिनदहाड़े की गई हत्या ने अमेरिका में ऐसे आंदोलन को जन्म दिया जिसमें हर उम्र, वर्ग और नस्ल के लोग शामिल हुए। इसी क्रम में डेमोक्रैट प्रत्याशी जो बाइडन द्वारा उपराष्ट्रपति पद के लिए भारतीय मूल की कमला हैरिस को नामांकित करना भी चर्चा में है। इन सबका चुनाव नतीजों पर आखिरी प्रभाव तो नतीजे घोषित होने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि बदजुबानी, बीमारी और नस्लवाद की कशमकश के बीच हो रहे 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव इतिहास में एक यादगार घटना के रूप में दर्ज हो रहे हैं।

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