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Durga Puja 2020: दशहरा के दिन क्यों मनाई जाती है सिंदूर खेला की रस्म, सुहाग से जुड़ा है रहस्य

Sindoor Khela 2020: शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिन दुर्गा पूजा और दशहरा के अवसर पर बंगाली समुदाय के लोग मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करते हैं। जिसे सिंदूर खेला के नाम से पहचाना जाता है। इस दिन पंडाल में मौजूद सभी सुहागन महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। यह खास उत्सव मां की विदाई के रूप में मनाया जाता है। 

धार्मिक महत्व-
सिंदूर खेला के दिन पान के पत्तों से मां दुर्गा के गालों को स्पर्श करते हुए उनकी मांग और माथे पर सिंदूर लगाकर महिलाएं अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना करती हैं। इसके बाद मां को पान और मिठाई का भोग लगाया जाता है। यह उत्सव महिलाएं दुर्गा विसर्जन या दशहरा के दिन मनाती हैं। 

धुनुची नृत्‍य की परंपरा-
सिंदूर खेला के दिन बंगाली समुदाय में धुनुची नृत्‍य करने की परंपरा भी है। यह खास तरह का नृत्य मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। 

सुहाग की लंबी उम्र-
कहा जाता है कि सबसे पहले लगभग 450 साल पहले बंगाल में दुर्गा विसर्जन से पहले सिंदूर खेला का उत्सव मनाया गया था। इस उत्सव को मनाने के पीछे लोगों की मान्यता थी कि ऐसा करने से मां दुर्गा उनके सुहाग की उम्र लंबी करेंगी।   

मां दुर्गा आती हैं अपने मायके- 
माना जाता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा 10 दिनों के लिए अपने मायके आती हैं। इन्हीं 10 दिनों को दुर्गा उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसके बाद 10वें दिन माता पार्वती अपने घर भगवान शिव के पास वापस कैलाश पर्वत पर चली जाती हैं। ससुराल भेजने से पहले मतलब विसर्जन से पहले मां दुर्गा के साथ पोटली में श्रृंगार का सामान और खाने की चीजें रखी जाती हैं।इस प्रथा को देवी बोरन कहा जाता है।

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