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सीबीआई पर बंदिशें

जिस तरह से ने सीबीआई को राज्य में जांच पड़ताल करने के लिए मिली आम इजाजत को वापस लिया है, वह देश में विकसित हो रही एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करता है। देश की प्रमुख जांच एजेंसी को अब राज्य में किसी तरह की खोजबीन शुरू करने से पहले हर केस के लिए अलग से राज्य सरकार की अनुमति प्राप्त करनी होगी। ऐसा करने वाला महाराष्ट्र देश का इकलौता नहीं, बल्कि पांचवां राज्य है।

इससे पहले पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान भी सीबीआई को नो एंट्री का बोर्ड दिखा चुके हैं। केंद्र सरकार के इशारों पर काम करने वाली एजेंसी सीबीआई को काफी पहले से कहा जा रहा है। खुद सुप्रीम कोर्ट उसे पिंजरे का तोता कह चुका है। इसके बावजूद राज्य सरकारों का एक-एक कर सीबीआई के कामकाज पर पाबंदियां लगाना एक नया चलन है। सवाल है कि पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या हो गया है कि राज्य सरकारें देश की प्रमुख जांच एजेंसी के खिलाफ खड़ी होने को मजबूर हो रही हैं।

एक बहुदलीय लोकतंत्र में केंद्र और राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें बनना सामान्य बात है। पहले भी ऐसी सरकारें रही हैं और तमाम सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टियां अपने राजनीतिक हितों का ख्याल भी रखती रही हैं। लेकिन नमूने के तौर पर सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में जिस तरह दो राज्यों की पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसियों के बीच टकरावपूर्ण माहौल बना और मुंबई पुलिस को चौतरफा निशाना बनाया गया, उसके बाद भी राज्य और केंद्र की सरकार के बीच भरोसा बना रहता तो इसे एक चमत्कार ही कहा जाता।

हालांकि तमाम हो-हल्ले और आरोप-प्रत्यारोप के बाद उस मामले से जुड़े तथ्य मुंबई पुलिस की जांच प्रक्रिया को ही सही साबित करते जान पड़ते हैं। वह प्रकरण अभी समाप्त भी नहीं हुआ था कि टीआरपी घोटाले का नया मामला सामने आ गया। मुंबई पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज करके जांच-पड़ताल शुरू की। कुछ लोग गिरफ्तार भी हुए हैं। लेकिन इसी बीच लखनऊ में टीआरपी की ही गड़बड़ियों की एक और शिकायत आई जिसे आधार बनाकर वहां की पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और फिर तुरत-फुरत वह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। इसके बाद यह आशंका तेज हो गई कि सुशांत केस की ही तरह एक बीजेपी शासित प्रदेश के जरिए यह केस भी मुंबई पुलिस से छीनकर सीबीआई को सौंपने की तैयारी चल रही है।

महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री बयान भी जारी कर चुके हैं कि सरकार के इस फैसले के पीछे मंशा उस कथित साजिश को नाकाम करने की है, क्योंकि राज्य सरकार मुंबई पुलिस को बदनाम करने और उसे अपना सामान्य कामकाज भी न करने देने के प्रयासों पर मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती। इन आरोपों की सचाई से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल उस अविश्वास का है जो राजनीतिक दलों तक सीमित न रहकर विभिन्न सरकारों और जांच एजेंसियों के कामकाज को प्रभावित करने लगा है। भरोसा बहाली के इंतजाम जल्दी न हुए तो देश को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।

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