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कैसे हो जाति जनगणना

सामाजिक-आर्थिक (एसईसीसी) को दस साल होने जा रहे हैं। नई जनगणना शुरू होने को है लिहाजा एसईसीसी का भी फिर से चर्चा में आना लाजिमी है। हालांकि फिलहाल सरकारी हलकों में शुरू हुई चर्चा का विषय यह है कि इस बार इसके ढांचे में कैसे बदलाव लाए जाने चाहिए। एसईसीसी पहली बार 2011 में ही हुई थी। उसकी प्रक्रियाओं में सुधार होने ही चाहिए, लेकिन यह मसला शुरू से विवादों में घिरा रहा है।

2011 की पिछली जनगणना प्रक्रिया शुरू होने के कुछ साल पहले से ही यह मांग शुरू हो गई थी कि उसमें जाति से जुड़े आंकड़े भी शामिल किए जाने चाहिए। तत्कालीन शुरू में इसके खिलाफ थी, लेकिन विपक्ष के अलावा कुछ सत्तारूढ़ घटक दलों के भी लगातार आग्रह पर एसईसीसी के रूप में इसे मंजूरी दे दी गई। 2011 में हुई इस कवायद के नतीजे जुलाई 2015 में जारी किए गए।

सामान्य जनगणना प्रक्रिया से अलग इसको इसी रूप में माना जा सकता है कि सामान्य जनगणना के केंद्र में व्यक्ति होता है, जबकि एसईसीसी के केंद्र में परिवार को रखा जाता है। इसके अलावा सामान्य जनगणना 1948 के सेंसस एक्ट के तहत की जाती है जिसके मुताबिक इकट्ठा की गई व्यक्तिगत सूचनाएं सरकार को गोपनीय रखनी होती हैं। मगर एसईसीसी के तहत जुटाईं गई सूचनाएं विभिन्न विभागों के साथ न केवल साझा की जा सकती हैं बल्कि उनके आधार पर अलग-अलग परिवारों को विभिन्न योजनाओं के फायदे दिए जा सकते हैं या उनसे वंचित किया जा सकता है। साफ है कि एसईसीसी के तहत सूचनाएं जुटाने या उन्हें विश्लेषित करने के तरीकों में बदलाव के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।

फिलहाल चल रही चर्चा के मुताबिक, गरीबी तय करने के पैमानों को महज आमदनी तक सीमित न रखते हुए थोड़ा व्यापक रूप देने पर विचार किया जा रहा है। ब्यौरे में जाएं तो विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच और भोजन की पौष्टिकता, पेयजल, बिजली आदि को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। इसे जरूरी इसलिए माना जा रहा है क्योंकि गरीब परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई आदि मोर्चों पर जिस तरह के नुकसान उठाने पड़ते हैं, उनका पूरा आकलन उन्हें गरीबी रेखा से नीचे रख देने भर से नहीं हो पाता।

इसके अलावा विभिन्न योजनाओं के जरिए गरीब आबादी को पक्के मकान, शौचालय, गैस कनेक्शन आदि मुहैया कराने की जो कोशिशें हाल के वर्षों में चलाई गईं उनके असर के सटीक आकलन के लिए भी गरीबी नापने के पैमानों को चुस्त रखना जरूरी है। एसईसीसी की मांग के पीछे एक बड़ा मकसद आरक्षण के ढांचे में बदलाव का रहा है, लिहाजा आगे हम इससे जुड़ी बहसों को कुछ अलग ही रूप लेते देख सकते हैं।

बहरहाल, अभी इस पर चर्चा शुरुआती अवस्था में हैं और इससे कोई नतीजा निकलने से बेहतर होगा कि इसे आगे बढ़ने दिया जाए। तबतक असल जरूरत इस बात पर नजर रखने की है कि एसईसीसी के नए पैमाने कहीं गरीबी और बदहाली को कागजों में ही निपटा देने का जरिया न बन जाएं।

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