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ठिठका हुआ रिजर्व बैंक

रिजर्व बैंक की मॉनिटरी पॉलिसी कमिटी (एमपीसी) की हर दूसरे महीने होने वाली बैठक इस बार नहीं हो सकी। यह कोई मामूली सूचना नहीं है। मंगलवार यानी 29 सितंबर से शुरू होकर इसे 1 अक्टूबर तक चलना था, लेकिन सोमवार को ही रिजर्व बैंक की तरफ से बैठक स्थगित किए जाने की घोषणा कर दी गई। आधिकारिक तौर पर न तो इसकी कोई वजह बताई गई है, न ही यह सूचना दी गई है कि बैठक कब तक के लिए टाली गई है। माना जा रहा है कि बैठक टलने का कारण इस कमिटी के बाहरी सदस्यों की समय पर नियुक्ति न हो पाना है। एमपीसी में छह सदस्य होते हैं जिनमें तीन आरबीआई के अंदर के होते हैं और तीन इससे बाहर के। अंदर के सदस्यों में गवर्नर, डेप्युटी गवर्नर और एग्जिक्युटिव डायरेक्टर (मॉनिटरी पॉलिसी) होते हैं।

आरबीआई से बाहर के तीनों सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत किए जाते हैं और इनका कार्यकाल चार साल का होता है। एमपीसी की व्यवस्था अक्टूबर 2016 से शुरू हुई तो इन तीनों सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो गया और अगस्त में हुई एमपीसी की पिछली बैठक के बाद तीनों इस कमिटी से हट गए। इसके बाद स्वाभाविक तौर पर अपेक्षा की जा रही थी कि सरकार इनकी जगह तीन नए सदस्यों को मनोनीत कर देगी, लेकिन उसकी तरफ से अबतक ऐसी कोई घोषणा नहीं की जा सकी है। नतीजा यह कि देश की मौद्रिक नीति तय करने वाली इस कमिटी की बैठक निर्धारित समय पर नहीं हो सकी और यह भी नहीं पता कि आगे कब होगी। ध्यान रहे, एमपीसी की बैठक बैंकिंग व्यवस्था के ही लिए नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है। कारण यह कि इसमें रिजर्व बैंक इकॉनमी में नकदी का फ्लो सुनिश्चित करने और मुद्रा स्फीति दर को नियंत्रित करने के लिए प्रमुख ब्याज दरें तय करता है, साथ ही देश की आर्थिक स्थिति का वस्तुगत आकलन भी पेश करता है, जिसके आधार पर निवेशक अपना रुझान तय करते हैं।

कोरोना और लॉकडाउन से उपजी चुनौतियों को ध्यान में रखें तो एमपीसी की इस बार वाली बैठक कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो जाती है। रिजर्व बैंक ने कर्जों की ईएमआई टालने जैसी कुछ रियायतें भी घोषित कर रखी हैं। इनके प्रभावों का सटीक आकलन होना जरूरी है, ताकि बैंकों द्वारा इन्हें बंद करने या आगे बढ़ाने का फैसला लिया जा सके। साफ है कि एमपीसी की बैठक न हो पाना एक ऐसी अनिश्चितता को जन्म दे रहा है, जो किसी आर्थिक तर्क से नहीं उपजी। यह सरकारी लापरवाही से या किसी विचित्र तर्क के झोंके में अर्थव्यवस्था पर बाहर से लादी गई है। वैसे भी महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति में ढिलाई का संदेश जाना किसी सरकार के लिए अच्छा नहीं होता। एनडीए-1 के दौरान लोकपाल की नियुक्ति में हुई करीब पांच साल की देरी पर आज भी सवाल पूछे जाते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार तीनों नियुक्तियां जल्द करेगी और एमपीसी की बैठक को लेकर बनी अनिश्चितता ज्यादा लंबी नहीं खिंचेगी।

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