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राजनीतिक पहल जरूरी

शनिवार की रात भारत-चीन सीमा पर दोनों तरफ की फौजी टुकड़ियों के बीच एक नए इलाके में झड़प होने की खबर है। इसमें किसी के हताहत होने की बात दोनों में से किसी पक्ष ने नहीं कही है, लेकिन भारतीय सेना के मुताबिक चीनी पक्ष की ओर से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बदलने की एक और कोशिश हुई जिसे नाकाम कर दिया गया।

सूचनाओं का नितांत अभाव इस संबंध में सबसे बड़ी बात है। सेना की तरफ से जारी किए गए संक्षिप्त बयान से जितनी जानकारी नहीं मिलती, उससे ज्यादा सवाल मन में उठते हैं। लेकिन इस बात की पुष्टि सेना ने भी की है कि इस बार टकराव जिस इलाके में हुआ है, वहां हाल तक कोई समस्या नहीं थी। यथास्थिति बदलने की यह ताजा कोशिश पैंगांग त्सो झील के दक्षिणी किनारे पर हुई है।

इस जगह दोनों पक्षों के दावों को 1962 के बाद से ही सेटल्ड माना जाता रहा है, लिहाजा मामला और ज्यादा गंभीर हो जाता है। गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद थोड़ा वक्त जरूर लगा, लेकिन दोनों पक्षों ने इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना मानकर बातचीत के जरिए नई सहमतियां बनाने की कोशिश शुरू की। उस घटना ने आपसी विश्वास को छिन्न-भिन्न कर दिया था। सवाल उठ रहा था कि जब पुरानी सहमतियों का ही सम्मान नहीं किया जाएगा तो नई सहमतियां बनाने का मतलब क्या रह जाता है। फिर भी तय हुआ कि गलवान की झड़प को एक अपवाद मान कर आगे बढ़ा जाए।

सैन्य कमांडरों के बीच कई दौर की बातचीत हुई जिससे कुछ जगहों पर आमने-सामने खड़ी फौजी टुकड़ियों को एक-दूसरे से थोड़ा दूर ले जाया जा सका। लेकिन इससे स्थायी महत्व का कुछ भी हासिल होता नहीं दिख रहा। भारत का कहना है कि सीमा पर मार्च से पहले की यथास्थिति को कायम किया जाए, फिर उसी आधार पर विवादों को सुलझाने के लिए बातचीत हो। मगर चीन की तरफ से इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आ रही है। दोनों सेनाओं के अपनी मौजूदा स्थिति से पीछे हटने के जिस विचार पर सहमति बनी थी, उस पर अमल को लेकर भी शिकायतें हैं।

ऐसे में दोनों तरफ से सीमा पर सैनिक जमावड़ा बढ़ना स्वाभाविक है। अभी स्थिति यह है कि भीषण तनाव की स्थिति में सीमा के दोनों तरफ हजारों सैनिक भरपूर जंगी साजो सामान के साथ तैनात हैं। दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों, दुनिया की दो सबसे ताकतवर फौजों का इस तरह आमने-सामने खड़े होना पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। एक बात तो तय है कि इस स्थिति में कोई भी पक्ष एक झटके में कुछ कर नहीं पाएगा। दूसरी बात यह कि एक जगह भी अगर गोलियां चलने लगीं तो टकराव को सीमित नहीं रखा जा सकेगा। जाहिर है, यह स्थिति लंबे समय तक जारी नहीं रहने दी जा सकती। सैन्य और राजनयिक स्तर पर कई दौरों की बातचीत कोई नतीजा नहीं दे पाई है, लिहाजा अभी जरूरत इस बात की है कि शीर्ष राजनीतिक स्तर से तनाव कम करने की कोई सार्थक पहल की जाए।

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