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जापान का ‘आबे’ युग

प्रधानमंत्री शिंजो आबे के इस्तीफे के साथ ही जापान में एक ऐसा दौर बीत रहा है, जिसने घोटालों और अन्य शर्मनाक विवादों के बीच हर साल एक नया प्रधानमंत्री पेश करने के लिए मशहूर इस देश की राजनीति को न केवल स्थिरता प्रदान की, बल्कि इसकी छवि एक गरिमावान कार्य जैसी बना दी। 2006 में आबे पहली बार प्रधानमंत्री बने और एक साल एक दिन इस पद पर रहने के बाद स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दे दिया। फिर 2007 से 2012 की अवधि में जापान ने पांच प्रधानमंत्री देखे।

यह अस्थिरता खत्म हुई दिसंबर 2012 में, जब शिंजो आबे ने सत्ता में वापसी की। उसके बाद 2014 और 2017 के आम चुनाव भारी बहुमत से जीतकर उन्होंने सबसे ज्यादा समय तक जापान का प्रधानमंत्री बने रहने का वह रेकॉर्ड अपने नाम किया, जो अब तक उनके चाचा एइसाकू सातो (1964 से 1972) के नाम दर्ज था। यही नहीं, जितना महत्वपूर्ण उनका इतने लंबे समय तक पद पर बने रहना है, उतनी ही खास वे स्थितियां भी हैं जिनमें उनका इस्तीफा आया है। यह इस्तीफा उन्होंने किसी विवाद या चुनावी पराजय की वजह से नहीं बल्कि पेट की असाध्य बीमारी के चलते दिया है।

बहरहाल, आबे के कार्यकाल को यादगार बनाने में काफी बड़ा योगदान उनकी नीतियों का है। उनकी गिनती इस सदी के दौरान कई देशों में उभरे उन दक्षिणपंथी स्ट्रॉन्गमैन नेताओं में होती है, जिनकी अपने देश की राजनीति पर पकड़ काफी सख्त है। आबे न केवल कंजर्वेटिव नेता हैं बल्कि अपने पुनरुत्थानवादी विचारों के लिए भी जाने जाते रहे हैं। उनकी आक्रामक आर्थिक नीतियों को रीगनॉमिक्स की तर्ज पर आबेनॉमिक्स कहा गया।

अपने कार्यकाल में उन्होंने सेना पर खर्च बढ़ाया और यह सुनिश्चित किया कि जापान को आर्थिक शक्ति के अलावा एक प्रमुख सामरिक शक्ति के रूप में भी देखा जाए। उत्तर कोरिया और चीन को घेरने में सक्रिय दिलचस्पी दिखाने वाली उनकी विदेश नीति का इसमें खासा योगदान रहा। जहां तक जापान और भारत के संबंधों का सवाल है तो आबे युग में वे पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रगाढ़ हुए।

जापान एक अर्से से बड़े पैमाने पर पूंजी का निर्यात करने वाला देश बना हुआ है। बीते तीन-चार दशकों में जापान की पूंजी और भारत की जमीन तथा श्रमशक्ति का संयोजन एक ऐसी ताकत के रूप में उभरा है, जिसकी दुनिया में एक अलग पहचान है। मेक इन इंडिया की घोषणा से पहले अगर किसी एक देश के साथ इस अवधारणा पर अमल शुरू हो चुका था तो वह जापान ही है। दिलचस्प बात है कि एक अभूतपूर्व आपदा (2011 की फुकुशीमा परमाणु दुर्घटना) की पृष्ठभूमि में शुरू हुआ आबे का कार्यकाल दूसरी अभूतपूर्व आपदा (कोविड-19 महामारी) की पृष्ठभूमि में समाप्त हो रहा है। उम्मीद करें कि उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी का समय भी न केवल जापान के लिए और ज्यादा शुभ हो, बल्कि भारत के साथ जापान के रिश्तों को भी नई ऊंचाई पर ले जाए।

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