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लॉकडाउनः जो नहीं पढ़ पा रहे

बच्चों से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ ने गुरुवार को जारी अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि दुनिया भर में 46 करोड़ 30 लाख बच्चे लॉकडाउन में स्कूल बंद होने के बाद से ही पढ़ाई के दायरे से बाहर हैं। दिलचस्प है कि लॉकडाउन के इकॉनमी पर पड़ने वाले विनाशकारी प्रभावों की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन महीनों से जो स्कूल-कॉलेज बंद पड़े हैं, उनमें पढ़ने वाले बच्चों पर पड़ रहे असर को लेकर खास चिंता नहीं दिखती। ऑनलाइन क्लासेज शुरू करके इनमें कई शैक्षिक संस्थाओं ने यह मान लिया कि उन्होंने अपनी तरफ से पढ़ाई जारी रखी है, मगर यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट इस धारणा के परखचे उड़ा देती है कि बच्चों की पढ़ाई पर लॉकडाउन का कुछ खास असर नहीं पड़ा है।

करीब 100 देशों के हालात का जायजा लेती इस रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल बंद होने का नुकसान दुनिया भर में करीब डेढ़ अरब बच्चों को हुआ है। भारत की बात करें तो 15 लाख स्कूल बंद हुए हैं और प्री-प्राइमरी से लेकर सेकंड्री तक के 28 करोड़ 60 लाख बच्चे प्रभावित हुए हैं, जिनमें 49 फीसदी लड़कियां हैं। ऑनलाइन क्लासेज की शक्ति और सीमा का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इंटरनेट कनेक्शन देश के 24 फीसदी घरों में ही मौजूद है और उनमें भी ज्यादातर का नेटवर्क समस्याग्रस्त है। रिपोर्ट में जल्द से जल्द स्कूल खोलने की जरूरत बताई गई है, लेकिन सच पूछें तो भारत में ऐसा करना अन्य कई देशों के मुकाबले ज्यादा जोखिम भरा है। एक तो यहां क्लासेज बड़ी-बड़ी हैं, हर क्लास में स्टूडेंट्स की संख्या ज्यादा है। दूसरे, इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिहाज से भी स्थिति खराब है। स्कूलों में शौचालयों की सीमित संख्या इस जोखिम को काफी बढ़ा देती है। इसके अलावा हमेशा मास्क लगाने और सुरक्षित दूरी बनाए रखने की उम्मीद भी बच्चों से नहीं की जा सकती। ध्यान रहे, स्कूली छात्रों में प्राइमरी विंग के बच्चों का अनुपात दुनिया के स्तर पर 49 फीसदी है। ऐसे में स्कूल जल्दी खोलना कोई अच्छा विकल्प नहीं है।

दूसरी तरफ ऑनलाइन क्लासेज के नाम पर चल रहे पढ़ाई के दिखावे को आधार बनाकर हम इस नतीजे पर भी नहीं पहुंच सकते कि सारे बच्चों तक शिक्षा की रोशनी पहंच रही है। हमें दुनिया के स्तर पर ऐसी कोई राह निकालनी होगी जिससे पढ़ाई से वंचित रह गए या पीछे छूट गए बच्चों को कोरोना का दौर गुजर जाने के बाद विशेष व्यवस्था के तहत अपना कोर्स पूरा करने का मौका मिले। भले ही गर्मी की छुट्टियों में या अगला सेशन थोड़ी देर से शुरू करके बीच के समय में विशेष क्लास लगानी पड़े, या कोई और तरीका अपनाया जाए, लेकिन इस साल का कोर्स कंप्लीट करने का मौका हर बच्चे को दिया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित नहीं किया गया तो इस अवधि में उनकी पढ़ाई को हुए नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो पाएगी और समाज और अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।

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