Home Reviews तब 800 रुपये वेतन नहीं दे पा रही थी कांग्रेस

तब 800 रुपये वेतन नहीं दे पा रही थी कांग्रेस

रशीद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार
साल 1978 में जनवरी महीने की कड़ाके की ठंड वाली सुबह थी। शोभन सिंह और विभाजित कांग्रेस के 20 कर्मचारी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में सबसे पहले 24 अकबर रोड में दाखिल हुए। दिल्ली के लुटियंस में टाइप सात का यह बंगला आंध्रप्रदेश से राज्यसभा सदस्य जे वेंकटस्वामी के नाम था। वेंकटस्वामी उन चंद नेताओं में थे जिन्होंने तब इंदिरा गांधी से जुड़े रहने का फैसला किया था। उस समय ज्यादातर कांग्रेस नेताओं ने इस डर से इंदिरा गांधी से दूरी बना ली थी कि उनसे निकटता जनता पार्टी सरकार को प्रतिशोधपूर्ण कार्रवाई के लिए आमंत्रित करेगी।

आपातकाल के बाद का समय इंदिरा गांधी के लिए परीक्षा साबित हो रहा था। न केवल वह अपनी सारी पावर गंवा चुकी थी बल्कि पद जाने के साथ ही उनका सरकारी आवास भी हाथ से निकल गया था। उनका महरौली स्थित फार्म हाउस भी अभी अधबना ही था और बहुत तेजी के साथ उनके दोस्त भी साथ छोड़ रहे थे, जिनमें विश्वसनीय दोस्त भी शामिल थे। जब इंदिरा गांधी की दिक्कतें और बढ़ीं तो उनके पुराने वफादार मोहम्मद युनूस ने अपना 12 विलिंगडन क्रीसेंट आवास उनके परिवार को रहने के लिए दिया और खुद दक्षिण दिल्ली स्थित अपने निजी आवास में चले गए। इस तरह 12 विलिंगडन क्रीसेंट गांधी परिवार का नया ठिकाना बना।

19th November 2017: 100 years of Indira Gandhi. She was the mother of every  Indian supremoइंदिरा गांधी वहां राजीव गांधी, सोनिया गांधी, बच्चे राहुल और प्रियंका, संजय गांधी, मेनका गांधी और पांच पालतू कुत्ते के साथ आईं लेकिन इस घर में इतनी जगह नहीं थी कि यहां से किसी तरह की राजनीतिक गतिविधियां चलाई जा सकें। इसलिए 24 अकबर रोड को कांग्रेस का नया हेडक्वॉर्टर बनाया गया जो कि अगले चार दशक बहुत भाग्यशाली साबित हुआ। इस भवन का एक फायदा यह भी था कि इसका एक दरवाजा 10 जनपथ को जोड़ता था, जो उस समय यूथ कांग्रेस का दफ्तर हुआ करता था और आज सोनिया गांधी का आवास है।

खाली हाथ थीं इंदिरा
जब 1980 में इंदिरा गांधी विशाल बहुमत के साथ में सत्ता में लौटीं तो उन्होंने 7, जंतर मंतर रोड पर दोबारा दावा नहीं किया, हालांकि उनके पुत्र संजय गांधी ऐसा चाहते थे। उन्होंने संजय गांधी से कहा कि पार्टी को एक बार नहीं बल्कि दो बार शून्य से बनाया है। वह फिर ऐसा करेंगी। वह इस नए कार्यालय को इस तरह से तैयार करेंगी, जो दशकों तक कार्यकर्ताओं के काम आएगा। 1978 में पार्टी विभाजन के बाद इंदिरा कांग्रेस के पास कुछ भी नहीं बचा था। उस समय के कार्यालय सचिव सादिक अली ने पार्टी से जुड़े तमाम दस्तावेज, यहां तक कि किताबें भी इंदिरा गांधी को सौंपने से इनकार कर दिया था। बूटा सिंह, एआर अंतुले और दूसरे नेता जब 24 अकबर रोड में दाखिल हुए तो वे खाली हाथ थे लेकिन इंदिरा गांधी की भविष्यवाणी सच साबित हुई।

24 अकबर रोड कांग्रेस के लिए नई जिंदगी साबित हुआ। जिस तरह मुगल सम्राट अकबर, जिसके नाम पर यह रोड है, शुरुआत में लड़खड़ाए थे लेकिन बाद में उन्होंने अपने को स्थापित किया, उसी तरह कांग्रेस ने भी यहां से शुरुआती मुश्किलों के बाद खुद को स्थापित किया। 24 अकबर रोड में दाखिल होने के बाद शोभन सिंह और दूसरे कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पार्टी पदाधिकारियों – अध्यक्ष इंदिरा गांधी, महासचिव-एआर अंतुले, बूटा सिंह, एपी सिंह, बीपी मौर्या और कोषाध्यक्ष प्रणब मुखर्जी के लिए अलग-अलग कक्ष व्यवस्थित करने का काम शुरू किया। सबसे बड़ा कमरा जो लिविंग-डाइिनंग रूम हुआ करता था, उसे अध्यक्ष के कार्यालय में बदल दिया गया। एक बेंत की कुर्सी और छोटी मेज का इंतजाम किया गया लेकिन दीवारें खाली थीं, फर्श पर बिछाने के लिए कालीन और डोरमेट तक नहीं थी।

शोभन सिंह जोकि 2009 तक कांग्रेस के साथ अपनी सेवा के लगातार 52 वर्ष पूरे कर चुके थे, याद करते हुए कहते हैं, ‘बूटा सिंह जी ने मुझसे कहा था कि पार्टी इस स्थिति में नहीं है कि मुझे तन्ख्वाह दे सके जोकि उस समय आठ सौ रुपये महीने हुआ करती थी। मैंने बूटा सिंह जी से कहा कि जबतक स्थितियां नहीं सुधरती हैं मैं तन्ख्वाह नहीं लूंगा। यह सुनकर बूटा सिंह जी खड़े हुए और मुझे अपनी बाहों में भर लिया।’

अवैध निर्माण का जोर
अब 24 अकबर रोड में बहुत सारा बदलाव हो चुका है। हालांकि जो मुख्य भवन है, उससे बहुत ज्यादा छेड़छाड़ नहीं हुई लेकिन अंदर ही अंदर बहुत ज्यादा विस्तार हुआ है। आठ कमरे वाले इस भवन में अब 34 कमरे हो चुके हैं। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और सीनियर महासचिव के हिस्से में मुख्य बंगला ही है। इसके अलावा कर्मचारियों के लिए आवासीय ब्लॉक बन चुके हैं। हर घर में बिजली, एसी, कूलर, फ्रिज लगा हुआ है। इनमें से ज्यादातर निर्माण अवैध हैं। असल में कांग्रेस जब-जब दिल्ली में सत्तारूढ़ हुई अर्बन और हाउसिंग मिनिस्टर के लिए अपनी वफादारी साबित करने के लिए नियमों की अनदेखी करके 24 अकबर रोड का विस्तार करना एक पैमाना बना।

बूटा सिंह जो कि इंदिरा गांधी की कैबिनेट (1983-84) में वर्क्स और हाउसिंग मिनिस्टर थे और शीला कौल जो कि नरसिम्हा सरकार में हाउसिंग मिनिस्टर थीं, अपने विभाग के दर्जनों अधिकारियों के साथ 24 अकबर रोड आया-जाया करते थे। ये मंत्री विभागीय अधिकारियों के साथ इस बात को लेकर मंत्रणा किया करते थे कि कैसे और ज्यादा कमरे बनवाए जा सकें। अधिकारियों ने नियम के विरुद्ध जाकर अवैध निर्माण की सलाह दी। एक बात जो अहम है, वह यह कि इंदिरा से लेकर सोनिया तक के कार्यकाल में कमरों की संख्या बढ़ाने पर तो जोर दिया जाता रहा लेकिन शौचालयों की संख्या बढ़ाने के बारे में नहीं सोचा गया जिससे कि वहां रहने वालों और आगंतुकों को सहूलियत हो सके।

(किदवई की पुस्तक ‘24 अकबर रोड’ से साभार)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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