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फ्यूजन एनर्जी का सपना सच होने की ओर

कोरोना काल की कुछेक गिनी-चुनी अच्छी बातें अगर दुनिया याद रखना चाहे तो उनमें एक यह होगी कि 28 जुलाई 2020 को दक्षिणी-पूर्वी फ्रांस के प्रॉवेंस इलाके में इटेर की असेंबलिंग शुरू हो गई। इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (इटेर) संसार का एक साझा सपना है। इससे जुड़ी एक खास बात हमारे लिए अलग से याद रखने की होगी कि इटेर की बुनियाद के तौर पर भारत का बनाया हुआ 2000 टन वजनी एक क्रायोस्टैट मई में ही जमीन में डाल दिया गया था। क्रायोस्टैट का इस्तेमाल शून्य से काफी नीचे के तापमान को लगातार स्थिर बनाए रखने के लिए किया जाता है। इटेर के मुख्य उपकरण अति न्यून तापमान पर काम करने वाले सुपर कंडक्टिव विद्युत चुंबक ही हैं। पूरे खेल में इनकी भूमिका क्या है, इसपर हम आगे बात करेंगे। अलबत्ता इटेर का मकसद सबको पता है- धरती को नुकसान पहुंचाए बिना बड़े पैमाने पर बिजली बनाने का तरीका खोजना।

रीगन और गोर्बाचेव
1985 में जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रॉनल्ड रीगन और सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव के बीच शीतयुद्ध के खात्मे को लेकर बातचीत शुरू हुई तो उसका एक पहलू इस प्रक्रिया को सकारात्मक धार देने का भी था। मसलन यह कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से संसार की ज्यादातर वैज्ञानिक प्रगति इन दोनों देशों की फौजी होड़ की ही देन थी। कहीं ऐसा न हो कि शांतिकाल में साइंस-टेक्नॉलजी के लिए पूंजी के सोते ही सूख जाएं। ऐसे में साझीदारी के लिए जो नए मुकाम सोचे गए उनमें एक फ्यूजन एनर्जी को जमीनी शक्ल देने का भी था। फिशन एनर्जी यानी भारी परमाणुओं को तोड़ने से उपजी ऊर्जा का पहला सबूत हिरोशिमा पर गिराया गया एटम बम था। परमाणु ऊर्जा के रूप में इसका सार्थक उपयोग भी होने लगा था, पर सबको पता था कि बिजली बनाने का यह तरीका खतरनाक है। तब तक अमेरिका में थ्री माइल आइलैंड की परमाणु दुर्घटना हो चुकी थी और सोवियत संघ में चेर्नोबिल अगले ही साल घटित हुआ। दोनों मामले बदस्तूर दफना दिए गए, यह और बात है।

फिशन एनर्जी यानी हल्के परमाणुओं को जोड़ने से जन्मी ऊर्जा के दर्शन भी हाइड्रोजन बम के रूप में दुनिया ने कर लिए थे। इस्तेमाल होने वाली चीजों के वजन के अनुपात में फिशन एनर्जी की मात्रा फ्यूजन एनर्जी से कहीं ज्यादा है, यह बात भी सबको पता थी। लेकिन इसे बिजली की शक्ल में कैसे ढाला जा सकता है, इस सवाल को लेकर इंजीनियरों ने तो क्या, वैज्ञानिकों ने भी सोचना शुरू नहीं किया था। मोटे तौर पर देखें तो हाइड्रोजन बम बनाने में एटम बम से पलीते का काम लिया जाता है। इसके भीतर हाइड्रोजन के भारी आइसोटोपों के बीच जो नाभिकीय क्रिया एक करोड़ डिग्री सेल्सियस पर एक्स-रे रिफ्लेक्टरों के जोर पर घटित होती है, उसे भला किस बिजलीघर में दोहराया जा सकेगा? कौन सी टर्बाइन इस 10 करोड़ डिग्री फ्यूजन टेंपरेचर को बिजली में बदलेगी? यह तो आसमान से गिरी बिजली को बल्ब में समेटने से भी ज्यादा मुश्किल होगा!

बहरहाल, भला हो यूरोपियन यूनियन (ईयू) का कि यह सपना असंभव से संभव होने की ओर बढ़ा। शुरू में फ्यूजन एनर्जी के बड़े इंटरनेशनल प्रॉजेक्ट के लिए ईयू के अलावा रूस, अमेरिका और जापान ही आगे आए, फिर इसमें भारत, चीन और दक्षिण कोरिया के रूप में तीन और एशियाई ताकतें शामिल हुईं। बजट तय हुआ 45 फीसदी ईयू और बचे 55 फीसदी में बाकी छह पार्टनर बराबर-बराबर। हमारा हिस्सा इसमें 9 फीसदी से जरा ज्यादा का है लेकिन ईयू की बड़ी बिरादरी को देखते हुए इटेर के मद में शायद ही किसी यूरोपीय मुल्क का खर्चा हमसे ज्यादा हो। हालांकि प्रॉजेक्ट खर्चीला है और इसमें लगने वाली कुल रकम 22 अरब डॉलर से 65 अरब डॉलर तक मानी जा रही है। इसमें 14 अरब डॉलर में तो पिछले साल सिर्फ बिल्डिंग बनकर खड़ी हुई है। इटेर के पैरलल एक और प्रॉजेक्ट इंटरनेशनल फ्यूजन मटीरियल्स इरेडिएशन फैसिलिटी (इफमिफ) भी चल रहा है, जिसमें भारत, चीन और दक्षिण कोरिया शामिल नहीं हैं, हालांकि फ्यूजन एनर्जी की कामयाबी काफी कुछ इफमिफ के नतीजों पर ही निर्भर करेगी।

बाकी दुनियादारी छोड़कर सिर्फ फ्यूजन एनर्जी और इटेर की टेक्नॉलजी पर बात करें तो इसके तीन हिस्से हैं। सबसे पहला, हाइड्रोजन के दोनों भारी आइसोटोपों ड्यूटीरियम और ट्राइटियम के प्लाज्मा तैयार करना और चुंबकों से उन्हें नियंत्रित करना। इटेर की असेंबलिंग 2024 में पूरी होगी और 2025 से वह प्लाज्मा पर काम शुरू कर देगा। अब, प्लाज्मा क्या है? मोटे तौर पर कहें तो परमाणु का मलबा, जिसमें ऋणात्मक आवेश वाले इलेक्ट्रॉन और धनात्मक आवेश वाले नाभिक, दोनों शामिल होते हैं। यह मलबा बहुत ऊंचे तापमान, लगभग डेढ़ करोड़ डिग्री सेल्सियस पर ही उपलब्ध होता है। इतनी गर्म चीज जिस भी पदार्थ के संपर्क में आएगी, उसका नामोनिशान मिट जाएगा। यह खुद बेमानी हो जाएगी सो अलग। अतिनिम्न तापमान परकाम करने वाले शक्तिशाली सुपर कंडक्टिव विद्युत चुंबकों का काम प्लाज्मा को किसी भी चीज के संपर्क में आने से रोकने और उसे तेजी से घुमाते रहने का है।

1000 सेकंड का लक्ष्य
फ्यूजन एनर्जी के उत्पादन का दूसरा चरण हाइड्रोजन की क्रमशः दुगुनी और तिगुनी भारी ड्यूटीरियम और ट्राइटियम के प्लाज्मा को मिलाकर उनका संलयन करते रहने का है। बताया जा चुका है कि यह प्रक्रिया दस करोड़ डिग्री तापमान देने वाली है। सूर्य का भी सात गुना यह तापमान संसार में अभी तक सिर्फ एक बार, चीन के ईस्ट फ्यूजन रिएक्टर में देखा गया है, जिसके नाम 101.2 सेकंड तक प्लाज्मा को नियंत्रित करने का कीर्तिमान भी दर्ज है। इटेर का लक्ष्य 2035 तक 1000 सेकंड (लगभग 17 मिनट) तक लगातार न सिर्फ ड्यूटीरियम और ट्राइटियम के प्लाज्मा को नियंत्रित करने का, बल्कि उनका फ्यूजन कराकर बाहर से ली गई कुल बिजली की दस गुनी ऊर्जा पैदा करने का है। इसका तीसरा चरण, यानी फ्यूजन एनर्जी को बिजली में बदलना इटेर का काम नहीं है। इसके लिए ‘डेमो’ और दुनिया के बहुतेरे सरकारी-प्राइवेट प्रॉजेक्ट अपने-अपने ढंग से कमर कस रहे हैं।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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