Home Reviews वह शिकस्त जिससे खोया नवाबों का इकबाल

वह शिकस्त जिससे खोया नवाबों का इकबाल

लेखक: कृष्ण प्रताप सिंह।।
सच्ची एकता, दूरदर्शी नीति और अपेक्षित रणकौशल के अभाव में शातिर शत्रु से निपटने की शासकों की साझा तदबीरें किस तरह उलटी पड़ जाती हैं, इसकी एक मिसाल 22 अक्टूबर, 1764 को बक्सर में हुई ऐतिहासिक लड़ाई भी है। दिल्ली के मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, बंगाल के नवाब मीर कासिम और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने सोचा था कि वे यह लड़ाई जीतकर ईस्ट इंडिया कंपनी को सारे देश से बाहर निकाल देंगे लेकिन कंपनी से सेनापति हेक्टर मुनरो ने इन तीनों की सेनाओं को रौंद डालने में तीन घंटे भी नहीं लगाए। कारण यह कि अपनी-अपनी ताकत के गुमान में फूली इन सेनाओं को आपस में समन्वय रखना जरा भी गवारा नहीं था।

इसका नतीजा यह रहा कि आखिरकार शुजाउद्दौला ने एक लंगड़ी हथिनी पर चढ़कर बक्सर की युद्धभूमि छोड़ देने में ही गनीमत समझी। इससे उनकी जान भले ही बच गई, मगर उनका इकबाल जाता रहा। आगे चलकर उन्होंने इसकी भारी कीमत चुकाई। गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने युद्ध का दोषी करार देकर उन पर पचास लाख रुपयों का हर्जाना लगा दिया। उन दिनों यह बहुत बड़ी रकम थी, जिसकी अदायगी के लिए शुजाउद्दौला की बेगम को अपने सारे बेशकीमती जेवर बेच देने पड़े। फिर भी हर्जाने की किस्तें नवंबर, 1766 तक अदा की जाती रहीं।

इस बीच लॉर्ड क्लाइव इंग्लैंड से नए गवर्नर जनरल बनकर आए तो वारेन हेस्टिंग्स से भी कई कदम आगे बढ़ गए। उन्होंने बेबस शुजाउद्दौला का भयादोहन-सा करते हुए उनसे एक ऐसी संधि पर दस्तखत करा लिए, जिससे कड़ा व इलाहाबाद के इलाके उनके बजाय दिल्ली के बादशाह के हो गए। इतिहासकार इस संधि को ‘इलाहाबाद की संधि’ कहते हैं। इसके एक प्रावधान के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी को अवध में निर्बाध व्यापार की अनुमति प्राप्त हो गई तो दूसरे के तहत उसके नवाब के लिए कंपनी से दोस्ती लाजिमी हो गई।

सात सितंबर, 1773 को वारेन हेस्टिंग्स लॉर्ड क्लाइव की जगह फिर गवर्नर जनरल बने तो उन्होंने बनारस पहुंचकर शुजाउद्दौला को एक और संधि के लिए मजबूर कर दिया। इसके तहत शुजाउद्दौला से पचास लाख रुपये वसूलकर कड़ा व इलाहाबाद के इलाके उन्हें लौटा दिए गए। इस संधि की शर्तों में एक यह भी थी कि शुजाउददौला अपने सैनिकों की संख्या 35 हजार तक सीमित कर लेंगे और बाहरी हमलों से सुरक्षा के लिए कंपनी की सेना पर निर्भर करेंगे। यह सेना उनकी राजधानी में उनके ही खर्च पर रहेगी। इतना ही नहीं, उनके दरबार में कंपनी का एक रेजिडेंट भी रहेगा।

यह अवध के राजकाज में कंपनी का सीधा दखल था, लेकिन शुजाउद्दौला के समक्ष चुपचाप इसे स्वीकार लेने के अलावा कोई चारा नहीं था। इसलिए उन्हें अपनी राजधानी फैजाबाद में ब्रिटिश सेना के लिए छावनी व रेजिडेंट के लिए आवास तामीर कराने ही पड़े।

26 जनवरी, 1775 को शुजाउद्दौला इस संसार को अलविदा कह गए और उनके बेटे आसफउद्दौला सूबे के चौथे नवाब बने तो कंपनी ने उन्हें भी चैन नहीं लेने दिया। 30 मई, 1775 को उनके साथ ‘फैजाबाद की संधि’ की, जिसके तहत बनारस व गाजीपुर जिले और इलाहाबाद के ऐतिहासिक किले के प्राधिकार उनसे छीन लिए। इस संधि में तय हुआ कि आसफउद्दौला अंग्रेजों को छोड़कर सारे यूरोपियनों को हर हाल में अवध से निकाल बाहर करेंगे और अपनी राजधानी में रह रही ब्रिटिश सेना का खर्च पचास लाख से बढ़ाकर 74 लाख कर देंगे। कोई तीसरा पक्ष उनकी या ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता का अतिक्रमण करेगा तो दोनों की सेनाएं मिलकर उसका मुकाबला करेंगी। थोड़े ही दिनों बाद आसफउद्दौला ने अवध की राजधानी फैजाबाद से लखनऊ स्थानांतरित कर दी तो उन्हें वहां अंग्रेज रेजिडेंट के लिए अपने दौलतखाने से भी भव्य रेजीडेंसी बनवानी पड़ी। साथ ही कंपनी की सेना के लिए हर तरह की सुविधा से संपन्न छावनी भी।

इतिहास गवाह है कि आगे चलकर रेजिडेंट अवध की सत्ता का ऐसा समानांतर केंद्र बन गया कि नवाब और उनके वजीर हर तरह से उसके हुक्म के मोहताज हो गए। 1857 में पहला स्वतंत्रता संग्राम छिड़ा तो यह सत्ता केंद्र इतना मजबूत हो चुका था कि बागी सैनिक लंबी घेरेबंदी के बावजूद रेजीडेंसी में नहीं घुस पाए।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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