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तीन तलाक का नया नाम तलाक-ए-अहसन

लेखक: नाइश हसन।।
22 अगस्त 2017 सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुस्तान से तलाक-ए-बिद्दत को खत्म करने का आदेश दिया था। इस आदेश पर खूब हंगामाखेज बहसें हुईं। मजहबी तंजीम मुस्लिम औरतों को सुप्रीम कोर्ट में कमअक्ल और तीन तलाक को आस्था बता रही थी तो दूसरी ओर सरकार का दर्द मुस्लिम औरतों के लिए छलका जा रहा था। दो अध्यादेशों से गुजरते हुए 2019 में आखिरकार तीन तलाक पर कानून बन तो गया, पर मुस्लिम औरतों की मुसीबतों का कोई अंत होता नहीं दिख रहा है।

तीन तलाक पर कानून बनने के इस एक साल के दरमियान पीड़ा के मामले आने कम नहीं हुए। कानून बनने के बाद आए तकरीबन 50 मामलों की हमने पड़ताल की तो उसमें दो बातें दिखती हैं। पहली यह कि तीन तलाक पाने के बाद जो महिलाएं थाने गईं, उनमें 50 प्रतिशत की एफआईआर ही नहीं लिखी गई। थाने एफआईआर दर्ज करने से बचते रहे, जैसे घरेलू हिंसा के तमाम मामलों में बचने की उनकी आदत पड़ चुकी है। दूसरे, मजहबी संगठनों ने तीन तलाक बंद होने के बाद एक चोर दरवाजा खोल लिया है।

Islamic divorce system: All you need to know - Times of ...अब वे तीन तलाक नहीं, तलाक-ए-अहसन के फतवे देने लगे हैं। ऐसे ही एक मामले में पता चला कि लॉकडाउन में पत्नी अपने मायके में थी। उन्हें स्पीड पोस्ट से फतवा मिला कि उनके पति ने उन्हें तलाक-ए-अहसन दे दिया है। एक दूसरे मामले में पति ने पत्नी को चिट्ठी लिखकर तलाक दे दिया और उसके बाद से वह गायब है। एक तीसरे मामले में पत्नी जब घर में ही थी, उसके पति ने एक दिन अचानक ही कहा कि वह उसे तलाक-ए-अहसन दे रहा है।

मजहबी अदालतों में जाने वाले तलाक के अनेकों मामलों में एक प्रतिशत महिलाएं भी मजहबी संगठनों के फतवे को चुनौती देने की हिम्मत नहीं कर पाईं, जबकि मजहबी संगठनों के फतवों को सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के एक फैसले में अमान्य करार दिया है। गौरतलब बात यह भी है कि तलाक के ऐसे फतवे मुस्लिम महिला विवाह संरक्षण अधिनियम 2019 कानून आने के बाद से और आने लगे। भगोड़े शौहरों को तलाक-ए-अहसन की याद यूं ही नहीं आई है। ऐसा गिरफ्तारी से बचने के लिए है। दूसरी तरफ दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि कानून से कहीं अधिक ढीली तो व्यवस्था की पकड़ है, क्योंकि जो महिलाएं इस एक साल के दौरान थाने गईं, उन्हें पुलिस का सहयोग लगभग नहीं ही मिला। यह सिस्टम की विफलता ही है। इसका फायदा भी पतियों ने उठाया और धार्मिक संगठनों की मदद से तलाक हासिल कर लिया। तलाक की यह झटपट व्यवस्था शर्मनाक तरीके से अभी भी जारी है।

talaq: Talaq said once is enough, says JIH women's wing | Nagpur ...तलाक-ए-अहसन का उल्लेख कुरान में नहीं मिलता, बल्कि उन किताबों में मिलता है, जिन्हें इन धार्मिक संगठनों ने तैयार किया है। तलाक-ए-अहसन में पति अपनी पत्नी को शुद्ध काल में केवल एक बार संबोधित करते हुए कहता है कि मैंने तुम्हें तलाक दिया। इसके बाद पत्नी तीन मासिक धर्म तक इद्दत का पालन करे। इस बीच संभोग भी न हो, पत्नी उसी घर में रहे। तीन माह पूरे होने पर अगर उनके बीच समझौता न हो, केवल वक्त बीत गया हो, तो भी तलाक पूर्ण मान लिया जाता है। तलाक की यह विधि अनिवार्य मध्यस्थता की भी बात नहीं करती। इसी का परिणाम दिख रहा है कि पति अब तीन तलाक न देकर तलाक-ए-अहसन दे रहे हैं और मौलवी इसे जायज ठहरा रहे हैं।

लंबी जंग के बाद भी औरत की स्थिति नहीं बदली। पहले एक सेकेंड में तलाक देकर वह घर से बेदखल की जाती थी, अब तीन महीने में की जा रही है। उसे न तब सुरक्षा मिलती थी, न अब मिल रही है। शरीयत का कानून या मुस्लिम विधि इंसानों का बनाया कानून है, उसे बदला जा सकता है। सन 632 अर्थात पैगंबर मोहम्म्द के बाद से कानून बनते और बदलते रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि भारत के संविधान के आलोक में इंसाफ पसंद पारिवारिक कानून बने और वह कायदे से लागू हो। वरना मुस्लिम औरतें यूं ही पति, ससुराल, फतवों और मौलवियों के बीच पिसती रहेंगी।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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