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कांग्रेस: टल गए जरूरी सवाल

कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं द्वारा पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे गए पत्र के कारण सोमवार को हुई कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक पार्टी के हालिया इतिहास का सर्वाधिक गरमा-गरमी वाला आयोजन बन गई। बावजूद इसके, यह सवाल बना ही रहा कि इससे पार्टी को मिला क्या। बैठक के अंत में सोनिया गांधी ‘आहत होने के बावजूद’ थोड़े और समय तक अंतरिम अध्यक्ष बने रहने के लिए मान गईं।

बड़े फैसलों के लिए छह महीने में ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी की बैठक बुलाई जाएगी। तब तक सोनिया गांधी बतौर अंतरिम अध्यक्ष पार्टी चलाती रहेंगी। जाहिर है, सारे जरूरी सवाल ज्यों के त्यों अपनी जगह पड़े हैं, हालांकि कांग्रेस में सार्वजनिक रूप से सवाल उठना भी कोई कम बड़ी बात नहीं है। ओल्ड गार्ड वर्सेज न्यू गार्ड के विवाद के बीच इस सवाल का कोई जवाब ढूंढना आज भी पहले जितना ही मुश्किल है कि क्या राहुल गांधी साल भर पहले अध्यक्ष पद से दिए गए अपने इस्तीफे पर पुनर्विचार करने को राजी होंगे, और हो भी गए तो क्या पूरी पार्टी उन्हें मन से स्वीकार कर पाएगी?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर मान-मनव्वल का कार्यक्रम सफल नहीं हुआ और बात गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को ही अध्यक्ष बनाने की ओर बढ़ी तो क्या हर राज्य में कम से कम दो गुटों में बंटे इन नेताओं के बीच से पार्टी के शीर्ष पद के लिए कोई एक सर्वमान्य नाम निकालना संभव होगा? अगर किसी तरह यह हो पाया और उस नाम को पार्टी ने स्वीकार कर लिया तो इस नए नेतृत्व और उसके पीछे चलने वाली पार्टी के साथ गांधी परिवार का कैसा रिश्ता रहेगा? क्या उस स्थिति को यह स्वीकार कर पाएगा, और क्या पार्टी उसकी छत्रछाया के बिना फल-फूल पाएगी?

पिछली आधी सदी से कांग्रेस का जो हाल बना हुआ है उसे देखते हुए नेहरू-गांधी परिवार के बगैर कांग्रेस की कल्पना करना बहुत कठिन है। हालांकि कांग्रेस चाहे तो यह बीच का रास्ता निकाल सकती है कि नेहरू-गांधी परिवार को रोजमर्रा नेतृत्व की जिम्मेदारी से मुक्त रखकर उसकी छत्रछाया उसी तरह अपने ऊपर बनाए रखे, जैसे बीजेपी में सीधा दखल न होने के बावजूद उसके सिर पर आरएसएस का साया हमेशा नजर आता है। एक बात तय है कि दैवी नेतृत्व के पांच साल बाद झरोखा दर्शन देने वाली राजनीति के दिन अब लद चुके हैं।

बीजेपी ने इधर जो राजनीतिक शैली अपनाई है, उसके सामने राष्ट्रीय ही नहीं, प्रदेश स्तर पर भी किसी ऐसी पार्टी का खड़े रहना मुश्किल है जो राजनीति को सिर्फ चुनावों के संदर्भ में देखने की आदी हो। कांग्रेस को जिंदा रहना है तो उसे पार्टी मशीनरी को चुस्त-दुरुस्त और चौबीसों घंटे, बारहों मास सक्रिय रखने वाला नेतृत्व अपनाना होगा। रही बात पार्टी से ऊपर एक सर्वमान्य चमत्कारिक व्यक्तित्व की तो इसके लिए एशिया में चेयरमैन और अयातुल्ला जैसी कितनी ही प्रायोगिक मिसालें मौजूद हैं, जिन्हें अपनाकर कांग्रेस अपने शीर्ष परिवार को संतुष्ट रख सकती है।

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