Home Reviews गौर से पढ़ना होगा छोटे देश का बड़ा संदेश

गौर से पढ़ना होगा छोटे देश का बड़ा संदेश

लेबनान बहुत छोटा सा देश है। करीब 70 लाख आबादीऔर साढ़े दस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल। मगर मानव समाज की उतार-चढ़ाव भरी यात्रा में इतिहास के किस मोड़ पर कौन सा महत्वपूर्ण संदेश कहां से आ जाएगा, कहा नहीं जा सकता। कभी सोवियत संघ जैसा महाबली देश टुकड़ों में बिखर कर इतिहास के लिए एक बड़ा संदेश छोड़ता है तो कभी नेपाल जैसा छोटा देश ‘मुक्ति युद्ध’ की कामयाबी से उस संदेश पर पुनर्विचार की जरूरत जता देता है। पश्चिम एशियाई मुल्क लेबनान कोई एक साल से जिस उथल-पुथल से गुजर रहा है वह सामान्य नहीं है। इस बीच यहां लगातार विरोध प्रदर्शन और आंदोलन होते रहे, हालांकि कोई निश्चित नेतृत्व इसके पीछे नहीं है। सिविल सोसाइटी की पहचान के साथ कई व्यक्ति और संगठन इसमें शामिल हैं, पर मूलतः यह एक जन आंदोलन है जो इस पूरी अवधि में लगभग शांतिपूर्ण रहा है। इसकी शक्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस दौरान यहां दो प्रधानमंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा है।

जंगल की आग
स्थानीय तौर पर इस आंदोलन को ‘अक्टूबर क्रांति’ का नाम दिया गया है क्योंकि विरोध प्रदर्शनों के इस सिलसिले की शुरुआत 17 अक्टूबर से हुई, जो दुनिया भर में रूस की समाजवादी क्रांति की तारीख के रूप में जाना जाता है। इसकी तात्कालिक वजह लेबनान के जंगलों में आग की करीब 100 घटनाएं बनीं जिनसे न केवल सैकड़ों लोग विस्थापित हुए बल्कि बड़े पैमाने पर हरियाली भी नष्ट हुई। लेबनानी लोग अपनी हरियाली पर गर्व करते रहे हैं। सरकार जंगल की आग पर काबू पाने की खास कोशिश करती नहीं दिखी, जिससे लोगों ने खुद को आहत महसूस किया। फिर भी यह तात्कालिक कारण ही था। महंगाई और बेरोजगारी लोगों के सब्र का पहले से इम्तहान ले रही थी। तेल और रोटी की कीमतें आसमान छू रही थीं। अगस्त में आम बेरोजगारी स्तर 25 फीसदी और युवा बेरोजगारी स्तर 37 फीसदी था। इसमें बिजली-पानी की किल्लत भी जोड़ लीजिए।

News24.com | Group Of Protesters Take Over Lebanon Foreign ...लेबनान में आठ घंटे रोज की पावर राशनिंग आम है। 24 घंटे बिजली की सुविधा ‘जेनरेटर माफिया’ के सहयोग से ही हासिल होती है जिसकी कीमत चुकानी पड़ती है। पीने का पानी भी बोतलों में ही मिल पाता है जो निजी कंपनियां बेचती हैं। ये सारे मुद्दे सरकार के नाकारेपन के प्रमाण के रूप में लोगों के सामने थे। बरसों से जमा गुस्सा इन सरकार विरोधी प्रदर्शनों में निकल रहा था। देखते-देखते विरोध प्रदर्शनों ने इतना तीखा रूप ले लिया कि सरकार इनकी अनदेखी नहीं कर सकी। प्रधानमंत्री साद हरीरी को इस्तीफे की घोषणा करनी पड़ी। शिक्षा मंत्री हसन दियाब को उनकी जगह प्रधानमंत्री बनाया गया। लेकिन इससे न तो हालात में कोई बदलाव आया, न ही लोगों को ऐसी कोई उम्मीद नजर आई। सो विरोध प्रदर्शन भी जारी रहे। लोगों का असंतोष बना रहा। उसका लोकतांत्रिक ढंग से इजहार होता रहा। पुलिस चौकसी, बंदोबस्त और गिरफ्तारी का अपना काम करती रही।

इस सबके बीच ही अगस्त के पहले सप्ताह में राजधानी बेरूत के बंदरगाह में हुए दो भीषण विस्फोटों ने न सिर्फ लेबनान बल्कि पूरी दुनिया को दहला दिया। इस घटना ने एक बार फिर सरकारी तंत्र की लापरवाही को रेखांकित किया। पता चला, करीब ढाई हजार टन विस्फोटक पदार्थ वहीं एक गोदाम में बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के छह साल से पड़ा हुआ था और उसी इमारत में पटाखों का स्टॉक भी रख दिया गया था। पहले दुर्घटनावश पटाखों में आग लगी, फिर गोदाम में पड़े अमोनियम नाइट्रेट ने कसर पूरी कर दी। इसकी उतनी ही विस्फोटक प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। विरोध प्रदर्शन का नया दौर शुरू हुआ। नतीजा यह कि नए प्रधानमंत्री ने भी इस्तीफे की घोषणा कर दी। जनवरी में आए हसन दियाब अब कामचलाऊ प्रधानमंत्री हैं और नई व्यवस्था होने तक इस पद की जिम्मेदारी देख रहे हैं।

विरोध प्रदर्शन अब भी जारी हैं। कोई नहीं जानता कि नई व्यवस्था क्या होगी, हसन दियाब की जगह कौन प्रधानमंत्री पद कौन संभालेगा। जो भी इस कुर्सी पर बैठेगा वह लोगों की समस्याएं हल करेगा, ऐसी उम्मीद किसी को नहीं है। उनकी समस्याएं कैसे हल होंगी, इसका भी कोई अंदाजा उन्हें नहीं है। वे बस यह चाहते हैं कि उनके देश का नेतृत्व उनकी समस्याएं हल करे। यह विचित्र स्थिति ही इतिहास के इस मोड़ पर लेबनान को खास बनाती है। लोकतंत्र में जनता की उदासीनता को तमाम समस्याओं की जड़ और उसकी जागरूकता को इनका हल माना जाता है। कहते हैं, जनता जाग जाए तो क्या नहीं हो सकता। पर लेबनान की जनता तो जागी हुई है।

Hassan Diab: Lebanese PM appeals for help after Beirut blast ...वह न केवल अपनी समस्याओं को समझ रही है बल्कि उनके हल के लिए सड़क पर उतरकर निरंतर आवाज उठा रही है, जेल जा रही है, लाठी खा रही है। फिर भी समाज किसी तरफ बढ़ता हुआ नहीं दिख रहा। आखिर क्यों? जवाब की तलाश शुरू करने से पहले लेबनान को खास बनाने वाले एक और महत्वपूर्ण फैक्टर पर गौर कर लेना जरूरी है। वह है वहां के शासन का सेक्टेरियन स्वरूप। पहचान का टकराव हल करने के लिए वहां देश की सभी धार्मिक पहचानों को शासन में भागीदारी देने की अनूठी व्यवस्था की गई है। वहां राष्ट्रपति हमेशा ईसाई, प्रधानमंत्री सुन्नी और संसद अध्यक्ष शिया समुदाय के होते हैं।

पहचान को प्रतिनिधित्व
गौर करने की बात यह है कि लोगों का असंतोष पिछले तीन दशक से लागू इस शासन पद्धति से भी है, जिसमें शासक अपने नीतिगत और प्रशासनिक दिवालिएपन को बड़ी आसानी से अपनी धार्मिक राजनीति के पीछे छिपा ले जाते हैं। इस तरह लेबनान अपने अनुभव से जो संदेश दे रहा है, उसमें दो तत्व साफ देखे जा सकते हैं। एक तो यह कि जनता का जागकर सड़क पर उतर आना सकारात्मक बदलाव के लिए काफी नहीं होता। और दूसरी बात यह कि पहचान को प्रतिनिधित्व देना राजनीतिक रूप से भले दुरुस्त हो, पर जरूरी नहीं कि इससे संबंधित समाज की समस्याओं का समाधान भी निकल आए।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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