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कोरोना काल में चुनाव

निर्वाचन आयोग ने शुक्रवार को कोरोना काल में चुनाव संचालित करने को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए। बिहार पहला राज्य है जहां ऐन कोरोना के दौरान विधानसभा चुनाव होने हैं। मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों के उपचुनाव भी इसके साथ ही कराए जाएंगे। ये चुनाव अपेक्षित समय पर और इन दिशा-निर्देशों के अनुरूप हुए तो निश्चित रूप से मतदाताओं और राजनीतिक दलों के लिए यह बिल्कुल नया चुनावी अनुभव साबित होगा।

चुनाव आयोग ने अपनी गाइडलाइंस में साफ किया है कि नामांकन के समय किसी भी प्रत्याशी के साथ दो से ज्यादा लोग मौजूद नहीं रहेंगे। घर-घर जाकर प्रचार करने का काम पांच से ज्यादा लोगों का समूह नहीं कर सकता। रोड शो में पांच से ज्यादा वाहन नहीं हो सकते। वोटरों को भी वोटिंग के दौरान ग्लव्स दिए जाने और कोरोना संक्रमित वोटरों के लिए विशेष व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं। जाहिर है, ये तमाम निर्देश महत्वपूर्ण हैं और कोरोना के दौरान चुनाव संचालित करने के खतरों को कम करने के लिए जरूरी हैं। लेकिन इन निर्देशों में वर्चुअल रैलियों का कोई जिक्र नहीं है, जिन्हें बिहार में पहले ही आजमाया जा चुका है।

संभव है, निर्वाचन आयोग इस बारे में अलग से कुछ कहे। लेकिन फिलहाल उसके कुछ न कहने को रेखांकित करना इसलिए जरूरी है क्योंकि बिहार में मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी समेत कई दलों ने निर्वाचन आयोग को दिए गए सुझावों में वर्चुअल रैलियों को लेवल प्लेइंग फील्ड के खिलाफ बताया था। टीवी जैसे व्यापक संचार माध्यम पर विपक्ष को कम स्पेस मिलना स्वाभाविक है, लिहाजा बिहार के ज्यादातर विपक्षी दल कोरोना के इस कहर के बीच राज्य में चुनाव कराने का ही विरोध कर रहे हैं।

कोई कह सकता है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव भी इसी दौर में होने जा रहे हैं, जबकि वहां कोरोना का प्रकोप बिहार से कहीं ज्यादा है। लेकिन एक तो अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्यक्ष प्रचार कम होता है और टीवी तथा अन्य मीडिया एकतरफा नहीं हो पाते, दूसरी बात यह कि वहां तय समय पर चुनाव कराना संवैधानिक बाध्यता है। अपने देश में विधानसभा चुनावों को लेकर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन का आसान विकल्प भी उपलब्ध है।

इसका दूसरा पहलू यह है कि अभी ऐसी कोई समय सीमा नहीं बांधी जा सकती, जिसके बाद कोरोना की बीमारी खत्म हो जाने की उम्मीद हो। ऐसे में यह सवाल जायज है कि जब जीवन के हर क्षेत्र में जोखिम उठाकर आगे बढ़ने का फैसला हो रहा है तो लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव चुनावों को ही अनिश्चित काल के लिए क्यों टाल दिया जाए। फैसला अंतिम तौर पर चुनाव आयोग को ही करना है और यह काम वह सभी संबंधित पक्षों पर अच्छी तरह विचार करके ही करेगा। लेकिन बेहतर होगा कि तिथियों की घोषणा करने से पहले वह सभी राजनीतिक दलों से एक बार फिर विचार-विमर्श कर ले। जरूरी है कि चुनाव आयोग के फैसले और इंतजाम न केवल निष्पक्ष हों, बल्कि राजनीतिक दलों और वोटरों को उनके निष्पक्ष होने का भरोसा भी हो।

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