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निशाने पर है हिंदी फिल्म इंडस्ट्री

लेखक: अजय ब्रह्मात्मज।।
घरों में बंद देश के नागरिक अभी मीडिया और सोशल मीडिया के जरिये ही बाहरी दुनिया से संपर्क रख पा रहे हैं। गौर करें तो इस दायरे में कोविद-19, बाढ़, मंदी, बेरोजगारी आदि कोई समस्या भारत में है ही नहीं। यहां सबसे बड़ा मुद्दा सुशांत सिंह राजपूत की मौत की गुत्थी है। इसके साथ ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को घेरने, लांछित और बदनाम करने की कोशिशें भी जारी हैं। इससे यह धारणा विकसित हो रही है कि यह बेहद गलीज इंडस्ट्री है। यहां नेपोटिज्म, भेदभाव और असमान व्यवहार का जबरदस्त चलन है। यह इंडस्ट्री इनसाइडर और आउटसाइडर के दो खेमों में बंटी हुई है। पहला खेमा संगठित, ताकतवर और नियंता की भूमिका निभाता है। दूसरा खेमा अपेक्षाकृत असंगठित और कमजोर होने की वजह से ‘रिसीविंग एंड’ पर रहता है।

ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है जैसे कोई खुला खेल चल रहा है, जबकि चुनने, काटने और छांटने का काम निजी रुचि से और व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखकर किया जाता है। कभी ‘टैलेंट कॉन्टेस्ट’ या अन्य प्रतियोगिताओं के माध्यम से नए चेहरों को बड़ी लॉन्चिंग मिल जाती थी। उसके भी पहले के दौर को याद करें तो पृथ्वीराज कपूर से लेकर धर्मेंद्र और मनोज कुमार तक किसी न किसी की मेहरबानी, पसंद या सिफारिश से फिल्म इंडस्ट्री में दाखिल हुए। नेपोटिज्म की बात करें तो पहला लिखित उदाहरण पृथ्वीराज कपूर का मिलता है। उन्होंने अपने भाई त्रिलोक कपूर की देवकी बोस से सिफारिश की थी और केदार शर्मा की मदद से इनकार कर दिया था। त्रिलोक कपूर को उनकी फिल्म ‘सीता’ (1934) में भूमिका मिल गई थी।

Kangana Ranaut puts an end to the nepotism debateकरण जौहर के चैट शो में कंगना रनौत ने साहसिक तरीके से उन्हें नेपोटिज्म का पैरोकार कहा था। तब से यह टर्म नए अर्थ के साथ चलन में आ गया है। शुरू में फिल्म इंडस्ट्री के स्थापित चेहरों ने इसका मखौल उड़ाने की कोशिश की, लेकिन इसकी गंभीरता को समझते हुए जल्दी ही वे रक्षात्मक मुद्रा में आ गए। इसी बीच सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत का मामला सामने आया। शुरू में तनाव और वंचना से पैदा हुई हताशा को वजह बताया गया। बाद में पूरे मामले का नैरेटिव बदलता गया। अभी यह मामला बिहार सरकार की अनुशंसा पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सीबीआई के पास चला गया है। गौरतलब है कि बाढ़ और कोविड-19 की विभीषिका के बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मामले में निजी रुचि के साथ पहल की। इसके अनेक निहितार्थों में से एक बिहार का चुनाव भी लक्षित किया जा रहा है।

फिलहाल हिंदी फिल्म इंडस्ट्री चौतरफा निशाने पर है। जिस ढंग से सोशल मीडिया और चैनलों से निशाना साधा जा रहा है, उसे देखते हुए यह उफान आकस्मिक नहीं लग रहा। सुनियोजित तरीके से मुहिम चल रही है और इनसाइड के लोकप्रिय सितारों और हस्तियों को बेधा जा रहा है। पिछले दिनों ‘गुंजन सक्सेना द कारगिल गर्ल’ की आईएमडीबीएम की साइट पर की गई ‘डाउन वोटिंग’ और ‘सड़क 2’ के ट्रेलर को मिले ‘डिसलाइक्स’ की बड़ी संख्या साक्ष्य है। इन दोनों उदाहरणों को मीडिया और सोशल मीडिया ने खूब उछाला और निष्कर्ष निकाला कि फिल्म प्रभावित हुई/होगी। सचाई यह रही कि ‘गुंजन सक्सेना’ को आम दर्शकों ने पसंद किया और उसकी आईएमडीबी रेटिंग बढ़ गई। रही ‘डिसलाइक’ की बात तो यह आकलन अभी नामुमकिन है कि ‘सड़क 2’ को कितने दर्शक मिलेंगे। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कोई बॉक्स ऑफिस तो होता नहीं, जिसके आधार पर दर्शकों के उत्साह या उनकी उदासीनता को आंका जा सके।

Videos of late Sushant Singh Rajput's doppelganger go viral; Soni ...मामले का दूसरा पक्ष यह है कि पिछले 6 सालों से सत्ता पर काबिज पार्टी को बहुसंख्यक हिंदू समाज का संवैधानिक समर्थन मिला है। इस क्रम में समाज का जो हिस्सा सक्रिय हुआ है, उसकी आकांक्षा और चाहत स्पष्ट है। यह उन सितारों को कटघरे में खड़ा कर रहा है, जो सरकारी नीतियों और फैसलों के समर्थन में नहीं दिखते। संगठित ट्रोलिंग और निंदा अभियान चलता है। यह भी कहा जाता है कि वर्तमान सत्ता और देश की लोकप्रिय राजनीति को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की सेक्युलर छवि पसंद नहीं है।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास पर सरसरी निगाह डालें तो यहां आजादी के बाद बगैर किसी धार्मिक भेदभाव के सभी प्रतिभाओं को बराबर मौका मिला। दर्शकों ने जब जिसे चाहा, उसे स्टार बनाया। यह सिर्फ संयोग है कि पिछले तीन दशकों में खानत्रयी ने हर पहलू से दर्शकों का मनोरंजन कर उन्हें संतुष्ट किया है। राहुल और प्रेम को पर्दे पर देखते हुए किसी को सुध नहीं रहती कि वह शाहरुख और सलमान को देख रहा है जो मुसलमान हैं। हिंदी फिल्मों में मुख्यतः वृहद हिंदू समाज, परिवार, घरेलू मूल्य, रिश्ते, प्रेम और दायित्व का बोध होता है। उनके नायक अपवाद स्वरूप ही मुसलमान, दलित और वंचित समाज से आते हैं। हिंदी फिल्मों ने भारतीय सामंती समाज, सामाजिक व्यवस्था और वर्गीकरण को अपना लिया है। कई दशकों तक नायक-नायिका का प्रेम ही सबसे बड़ा विद्रोह बना रहा। किरदारों का सारा संघर्ष प्रेमी/प्रेमिका को हासिल करने तक ही सीमित रहा।

निजी जिंदगी और आचरण में प्रगतिशील मूल्यों में यकीन करने वाले फिल्म बिरादरी के सदस्य भी व्यावसायिक हित में रूढ़िवादी, पारंपरिक, यथास्थितिवादी और फॉर्म्युलाबद्ध कहानियों को प्रश्रय देते रहे हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की मुख्यधारा कमोबेश सदियों से चले आ रहे मूल्य और आदर्श से ही परिचालित रहती है। अब यह कोशिश है कि ‘राष्ट्रवाद के नवाचार’ का पालन हो और फिल्में घोषित रूप से सत्ताधारी ‘राष्ट्रवादी’ सोच और नीतियों को कहानी का रूप दें। सत्ताधारी पार्टियां हर दौर में ऐसी कोशिश करती रही हैं। हिंदी फिल्मों पर नेहरू युग का प्रभाव स्पष्ट है। इंदिरा गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम पर भी फिल्में बनी हैं। अभी केवल अक्षय कुमार ऐसी थीम की कहानियां चुन रहे हैं और सफल भी हैं। निकट भविष्य में अनेक फिल्में आएंगी, जो भारत सरकार और सत्ताधारी विचारों के कोरस में दिखेंगी और विरोधी सोच तथा विचारों के फिल्मकारों और कलाकारों पर संगठित आक्रमण और तेज होगा।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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