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कांग्रेस: परिवार से बाहर नेतृत्व

राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ने के बाद से ही कांग्रेस में थोड़े-थोड़े समय पर यह चर्चा उठती रही है कि उन्हें मनाने का प्रयास चल रहा है, या उन्हें मना लिया गया है, या फिर यह कि आज नहीं तो कल अध्यक्ष उन्हें ही बनना है। इससे अलग कोई चर्चा या मांग होती है तो यह कि प्रियंका गांधी को अध्यक्ष पद संभाल लेना चाहिए। एक साल से ज्यादा समय हो जाने के बाद यह पहला मौका है जब राहुल और प्रियंका, दोनों ने एक साथ यह स्पष्ट किया है कि गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को ही कांग्रेस अध्यक्ष होना चाहिए।

एक पुस्तक के लिए दिए इंटरव्यू में दोनों ने अलग-अलग ढंग से यही बात कही है, हालांकि ये इंटरव्यू साल भर पहले लिए गए हैं। दोनों की यह स्पष्टता अच्छी है लेकिन सवाल यह है कि अगर पार्टी के शिखर पर चीजें इतनी स्पष्ट हैं तो फिर पार्टी को इस दिशा में आगे बढ़ने में इतना वक्त क्यों लग रहा है? इस उलझन को सुलझाने के लिए जरूरी सुराग हमें कांग्रेस के अतीत में मिलते हैं।

इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने और 1969 में कांग्रेस की टूट के बाद इंदिरा कांग्रेस के नाम से अपनी अलग पार्टी बनाने के साथ ही पार्टी पर उनके पारिवारिक सदस्यों का दबदबा इतना बढ़ गया कि उनकी छाया से बाहर निकल कर अपनी समझ से काम करने वाले किसी पार्टी अध्यक्ष की कल्पना करना भी कठिन हो गया। तब से अब तक 51 वर्षों की इस अवधि में दो अपवादों को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस अध्यक्ष या तो गांधी परिवार का ही कोई सदस्य रहा या फिर देवकांत बरुआ जैसे व्यक्ति, जिन्हें इस परिवार से अलग दिखने की कोई जरूरत ही नहीं थी।

ये दो अपवाद थे पीवी नरसिंह राव और सीताराम केसरी। दोनों के कार्यकाल में पार्टी गांधी परिवार की छाया से बाहर निकलती दिखी, लेकिन गांधी परिवार से नजदीकी का दावा करने वाले नेताओं ने इन दोनों की राह में कांटे बिछाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पद से हटने के बाद दोनों पार्टी में हाशिये पर, बल्कि उससे भी बाहर फेंक दिए गए। ऐसे में गांधी परिवार की ओर से बार-बार स्पष्ट करने के बाद भी कोई इस पद में रुचि नहीं दिखा रहा तो यह स्वाभाविक है। जाहिर है, यह गतिरोध भी गांधी परिवार को ही तोड़ना होगा। उसे अपनी तरफ से सक्रिय पहलकदमी लेकर कांग्रेस में नया अध्यक्ष चुने जाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा।

इस पार्टी में अनुभवी और व्यावहारिक व्यक्तित्वों की कमी नहीं है। बेहतर होगा कि अध्यक्ष पद के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को चुना जाए जिसकी न केवल पार्टी के अंदर बल्कि आंदोलन और राजनीति की अन्य धाराओं में भी स्वीकार्यता हो और जो कांग्रेस को एक बड़े संवाद की धुरी बना सके। इस नाजुक दौर में पार्टी यह बदलाव कर पाती है तो न सिर्फ उसे नई गति मिलेगी, बल्कि समाज की व्यापक लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति का नया जरिया भी मिलेगा।

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