Home News जरूरतमंदों का हाथ थामने की सीख मां से मिली: सोनू सूद

जरूरतमंदों का हाथ थामने की सीख मां से मिली: सोनू सूद

बॉलिवुड अभिनेता सोनू सूद लॉकडाउन में शहरों में फंसे लाखों प्रवासी मजदूरों के लिए मसीहा साबित हुए हैं। प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने की उनकी पहल में उन्हें रोजगार देने से लेकर, जरूरतमंदों को मेडिकल हेल्प और खाना मुहैया कराने तक तमाम तरह के कामों के जरिए ये रील हीरो रियल हीरो बन बैठे हैं। आजादी की 74 वीं सालगिरह के मौके पर वे आजादी के मायनों, समाज सेवा, अपनी मां, पहली कमाई, रिजेक्शन, संघर्ष और परिवार के बातें करते हैं।

कोरोना काल में अब लोगों को किस तरह से आजादी का जश्न मनाना चाहिए?
-देखिए मेरे लिए आजादी वो है कि लोगों के मन में कोरोना का जो डर बैठा हुआ है, उसे पराजित करके वे घर से बाहर निकलें। ये सोच कर घर में न बैठें कि मैं सेफ हूं। आप अपने घर से बाहर निकलें और लोगों की मदद करें। जिस आप में घर से बाहर निकलकर लोगों की मदद करने की ताकत आएगी, आप सही मायनों में उसी दिन अपनी आजादी का जश्न मना सकेंगे।

स्वंत्रता दिवस की कोई खूबसूरत याद? आपने पहली बार खुद को कब आजाद महसूस किया?
-बचपन में तो आजादी का दिन स्कूल जाकर झंडा फहराना और चॉकलेट पाने की खुशी में बीतता था। उस दिन यह सोचकर भी खुश रहते थे कि पढ़ाई से छुट्टी मिलेगी। उस वक्त आजादी के अर्थ की समझ नहीं थी। मगर कोरोना काल में जब मैं प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचाने की मुहिम के तहत घर से निकला और जिस दिन मैंने पहली बस उनके घरों के लिए रवाना की, तो उस वक्त छोटे-छोटे बच्चों और मुरझाए चेहरों पर जो मुस्कान थी और हाथ हिलाते हुए वे जिस तरह से मुझे बाय-बाय कर रहे थे, उस वक्त मुझे लगा कि लॉकडाउन की बेबसी के बीच वे आजाद होकर अपने घरों का रुख कर रहे हैं। तभी मैंने भी अपनी आजादी महसूस की।

आपको कोरोना काल का मसीहा, अवतार और फरिश्ता जैसे खिताबों से नवाजा जा रहा है। आपके फेस के टैटू और साड़ी बन चुकी हैं।
-यह लोगों के प्यार और विश्वास को दिखाने का एक तरीका है और उनके इस प्यार से मुझे लगता है कि मैं सही रास्ते पर हूं। ऐसे समय में मैं अपने माता-पिता को बहुत मिस करता हूं कि वे होते, तो उन्हें कितनी ज्यादा खुशी होती। हालांकि जब मुझे मेरे फैन ने अपने हाथों पर मेरे फेस का टैटू दिखाया तो मैं शरमा गया था। मैंने फैन से यही कहा कि ऐसा करने की जरूरत नहीं थी। मैं यही कहूंगा कि कहीं ना कहीं माता-पिता और भगवान की दुआएं रही हैं, जो लोग मुझे इस कदर चाहने लगे हैं।


आप अपनी स्वर्गीय मां से बहुत क्लोज थे। आपको उनसे सबसे बड़ी सीख क्या मिली?
-मेरी मां ने सीख दी थी कि तुम कामयाब तभी हो, जब तुम किसी का हाथ थाम सको। मेरी मां प्रफेसर थीं और वे बच्चों को फ्री में पढ़ाया करती थीं। उनके कई स्टूडेंट्स अमीरजादे भी हुआ करते थे, जो अक्सर कॉलेज बंक कर देते थे। स्टूडेंट्स की सोच यही होती थी कि हमारे माता-पिता के पास इतना पैसा है, तो हमें पढ़ने की जरूरत क्या है? तब मेरी मम्मी अपने किसी दूसरे स्टूडेंट के स्कूटर पर उन बच्चों के गांव जातीं और उनके माता-पिता को ताकीद करके आतीं कि उनके बच्चों के लिए एजुकेशन कितनी जरूरी है। सालों बाद उन्हीं बच्चों ने अपना मुकाम बनाया। मेरी मां हमेशा कहा करती थीं कि घर, शिक्षा और रोजगार जरूरी है।

आप एक लाख लोगों को रोजगार देने की पहल की है? इसे आप मुकम्मल कैसे करेंगे?
-ये पहल मैं प्रवासी रोजगार मुहिम के तहत कर रहा हूं। कई लोगों को काम करवाने वालों की जरूरत है, तो कइयों को काम की। मैंने ट्राइडेंट्स जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ टाइ-अप किया। इसके लिए मैंने पोर्टल और मोबाइल ऐप लॉन्च किया। जरूरतमंद लोग मुझ तक पहुंच गए हैं। अभी एक हफ्ते के अदंर दस हजार इंटरव्यूज में हमें देखना होगा कि उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार काम मिले। कोरोना काल में लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, उनकी कमाई का जरिया बंद हो गया है।

आपकी पहली कमाई क्या थी?
-मेरी पहली कमाई थी दो हजार रुपये। एक छोटे-से विज्ञापन फिल्म में मुझे एक छोटा-सा रोल मिला था। अपनी उस पहली कमाई से मैंने अपने घर का किराया अदा किया था और अपनी मम्मी को एक पर्स गिफ्ट किया था।


आपके स्ट्रगल डेज कैसे थे? क्या कभी आप रिजेक्ट हुए?
-मैंने अपने हिस्से का स्ट्रगल किया है और वो आज भी जारी है। शुरू-शुरू में घंटों पैदल चला करता था। अंधेरी से बांद्रा, बांद्रा से अंधेरी, मैं सोचता जॉगिंग भी हो जाएगी और स्ट्रगल भी। मैं पंजाब से मुंबई चालू टिकट में आया था और यही सोच कर कि एक साल में कुछ कर दिखाउंगा, मगर मुझे मौका मिलने में सालों लग गए। आज मेरे पास कई बड़े ब्रांड्स के एड्स के प्रस्ताव की लंबी लाइन गई हुई है, मगर एक समय ऐसा था, जब मैं रोजाना रिजेक्ट होता था। मैं तीन साल तक लगातार फेमस स्टूडियो में एड फिल्म के ऑडिशन के लिए जाता था और मेरा सिलेक्शन नहीं होता था। मैं आज के युवाओं से यही कहना चाहूंगा कि निराश न हों, सब्र रखें। समय आने में समय लगता है। जब आपका समय आएगा हर चीज बदल जाएगी।

अपनी समाज सेवा के दौरान आपके दिल को छूनेवाली कौन-सी घटना रही है?
-हर रोज मैं जज्बाती हो जाता हूं। कल ही मैंने प्रज्ञा मिश्रा से फोन पर बात की और विडियो कॉल किया। यह लड़की लिगामेंट फ्रेक्चर के बाद महीनों से दर्द झेल रही थी, मगर इसके ऑपरेशन के बाद इसके चेहरे की मुस्कुराहट ने मुझे बहुत भावुक कर दिया। उसी तरह जाने-माने खिलाड़ी सुदामा यादव की सर्जरी का जब मैं जरिया बना, तो उसकी रुंधी हुई आवाज से मुझे रोना आ गया था। कॉमनवेल्थ गेम्स की गोल्ड मेडलिस्ट अमृतपाल कौर की सर्जरी करवा कर मुझे लगा कि मैं इनकी जिंदगी को बदल पाया। उस वक्त तो मेरी आंखें नम हो गईं, जब मेरे द्वारा दरभंगा भेजी गई बस में एक गर्भवती महिला को वहां जाकर बेटा हुआ और उन्होंने अपने बेटे का नाम सोनू सूद श्रीवास्तव रखा।

कोरोना काल में आप जब प्रवासी मजदूरों के लिए घर से निकल कर सड़कों पर उतर आए, तो आपके परिवार को आपके कोरोना संक्रमित होने के डर ने नहीं सताया?
-परिवार को हर रोज चिंता होती है कि मैं कहीं संक्रमित न हो जाऊं? मैं हर रोज उनसे कहता हूं कि आज जाने दो, कल से नहीं जाऊंगा। हर रोज मैं एक नया वादा करता हूं और अगले दिन उसे तोड़ देता हूं और अब तो उन्होंने मेरे वादों पर ऐतबार करना भी छोड़ दिया है। अगर उनका सपोर्ट न मिला होता, तो मैं इतना सारा काम कभी न कर पाता।

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