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खुदा हाफिज

पता है, हम भारतीयों के साथ दिक्कत क्या है? जब हमारी सरकारें हमें नौकरियां नहीं दे पातीं तो हमें मजबूरन विदेश में नौकरी करने के लिए जाना पड़ता है। खुशी से कोई नहीं जाता बल्कि केवल अपने परिवार के भविष्य के लिए दूसरे देश, दूसरे समाज में खुद को खपाने जाना पड़ता है। सोचिए, ऐसे में आपका कोई अपना विदेश में नौकरी करने गया हो और बहुत ही बुरी स्थिति में फंस गया हो तो आप उस अपने को बचाने के लिए किस हद तक जा सकते हैं? कुछ ऐसी ही कहानी है ‘खुदा ‘।

कहानी: लखनऊ का एक साधारण परिवार है। उसका सॉफ्टवेअर इंजिनियर बेटा है समीर चौधरी () जिसकी अरेंज मैरेज होती है (शिवालिका ओबेरॉय) से। नरगिस के मां-बाप ने इंटर-रिलीजन मैरेज की है इसलिए समीर और नरगिस की शादी हिंदू और मुस्लिम दोनों रीति-रिवाजों से होती है। फिर आता है 2008 का इकनॉमिक स्लोडाउन और इसमें समीर और नरगिस दोनों का काम-धंधा ठप पड़ जाता है। दोनों सोचते हैं कि किसी बाहर देश (एक काल्पनिक देश नोमान) में जाकर पैसा कमाएंगे लेकिन नरगिस को तो नौकरी मिलती है लेकिन समीर को नहीं। नरगिस के जाते ही पता चलता है कि वह गलत लोगों के चंगुल में फंस चुकी है और उससे जबरन जिस्मफरोशी कराई जा रही है। इसके बाद समीर बिना कुछ सोचे समझे अपनी बीवी को वापस घर लाने के मिशन पर निकल पड़ता है। आगे क्या-क्या और कितना कुछ होता है इसके लिए आपको फिल्म देखनी होगी।

रिव्यू: बॉलिवुड की फिल्मों को इमोशनल संबंध बांधते हैं और यहां समीर और नरगिस का संबंध आपको फिल्म से जोड़ देगा। हालांकि नाटकीय घटनाक्रम कुछ ऐसे हैं कि इंटरनैशनल पुलिस एजेंसी के इमोशनल होते लोग पूरी फिल्म की कहानी पर बट्टा लगा देते हैं। विद्युत जामवाल दुनिया के कुछ सबसे बेहतरीन स्टंट करने वाले कलाकारों में से एक हैं तो आपको उनका भरपूर ऐक्शन देखने को मिलेगा। केवल ऐक्शन नहीं बल्कि विद्युत जामवाल ऐक्टिंग भी कर सकते हैं और निराश नहीं करते। शिवालिका ओबेरॉय के पास नरगिस के किरदार में करने के लिए कुछ खास नहीं था लेकिन वह खूबसूरत लगी हैं। फिल्म का सरप्राइज पैकेज अन्नू कपूर हैं। अफगानी पठान उस्मान का किरदार निभाते हुए उनके डायलॉग और एक्सप्रेशन इतने ज्यादा मजबूत हैं कि हर सीन के फ्रेम में विद्युत जामवाल कमजोर पड़ जाते हैं। इसमें विद्युत की गलती नहीं है, अन्नू कपूर हैं ही ऐसे ऐक्टर। विलन के रोल में नवाब शाह एकदम सटीक हैं। लेकिन असली विलन कौन है यह आपको फिल्म के अंत में पता चलता है।

एक इंटरनैशनल एजेंसी के लिए काम करने वाली आहना कुमरा और शिव पंडित बेहद नाटकीय लगे हैं। फिल्म कहानी का मेन पार्ट आते ही यह पटरी से उतर जाती है। फिल्म की कहानी अच्छी है लेकिन स्क्रीनप्ले लचर है और अरबी बोलने वाले देश में उर्दू या हिंदी बोलते हुए पुलिसवाले एकदम अजीब से लगते हैं। यह फिल्म एक अच्छी कहानी पर बनाई गई लचर फिल्म है। सोनू निगम की आवाज में गाया हुआ ‘तेरे संग हूं आखिरी कदम तक’ अच्छा बन पड़ा है और सुकून देता है। बाकी म्यूजिक में ऐसा कुछ खास नहीं है।

क्यों देखें: विद्युत जामवाल अच्छे लगे हैं। अगर उनके ऐक्शन के फैन हैं तो यह फिल्म देख सकते हैं, निराश नहीं होंगे।

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