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पाकिस्तान: मुसीबत गले पड़ी

कश्मीर को लेकर अपने अति उत्साह के कारण पाकिस्तान एक गहरी मुसीबत में फंस गया है। सऊदी अरब ने उसके साथ हुआ कर्ज और तेल सप्लाई का समझौता रद्द कर दिया है। इस वजह से पाकिस्तान को न केवल 1 अरब डॉलर की तुरंत अदायगी करनी पड़ी बल्कि उधार में तेल की आपूर्ति बंद होने से उसके सामने अचानक एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

समस्या तब हुई जब पिछले हफ्ते पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) से कश्मीर के सवाल पर विदेश मंत्रियों की परिषद की खास बैठक बुलाने की मांग अत्यंत आक्रामक अंदाज में उठाई। उन्होंने कहा कि ‘मैं एक बार फिर ओआईसी से सम्मानपूर्वक कह रहा हूं कि हम कश्मीर पर विदेश मंत्रियों की परिषद की बैठक चाहते हैं। अगर आप यह बैठक नहीं बुला सकते तो मजबूर होकर मुझे प्रधानमंत्री इमरान खान से कहना पड़ेगा कि वे उन इस्लामी देशों की बैठक बुलाएं जो इस मुद्दे पर हमारे साथ खड़े होने को तैयार हैं।’

वैसे पाकिस्तान की इस मसले पर हताशा समझी जा सकती है। नाकामियों के लंबे दौर को छोड़ भी दें तो भारत द्वारा अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिला विशेष दर्जा समाप्त किए जाने के फैसले के बाद पाकिस्तान को लगा था कि वह अब इस मसले को भुना ले जाएगा। उसने पूरी ताकत से हर मंच पर इस मसले को उठाया, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिससे लगे कि दुनिया इस मुद्दे पर उसके साथ है। पिछले हफ्ते इस घोषणा को एक साल पूरा होने के मौके पर जब कुरैशी मीडिया को संबोधित कर रहे थे तो संभवतः अब तक की असफलताओं से उपजी हताशा उन पर हावी हो गई। कारण जो भी हो, पर उन्होंने जो कहा, उसका सीधा मतलब यह था कि वे ओआईसी को तोड़ने की बात कर रहे हैं।

दूसरे शब्दों में यह सऊदी अरब को धमकी थी कि अगर उसने कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान का कहा न माना तो इस्लामी देशों का नेतृत्व उसके हाथों से छिन जाएगा। तुर्की की अगुआई में हाल के वर्षों में उभर रहे इस्लामी देशों के एक अलग केंद्र ने कुछ महीने पहले कश्मीर पर एक अलग बैठक बुलाकर इस धमकी के हवा-हवाई न होने की पृष्ठभूमि भी बना दी। सो, सऊदी अरब ने देखा कि इस चींटी के पर निकल आए हैं तो उसने तत्काल कार्रवाई कर पाकिस्तान को उसकी औकात बताने में देर नहीं की।

कूटनीति का यह सबक पाकिस्तान के लिए सचमुच काफी महंगा पड़ने वाला है। देखना होगा कि इस मुसीबत से निकलने का वह क्या तरीका ढूंढता है, लेकिन आज इस पड़ोसी मुल्क के स्वतंत्रता दिवस (14 अगस्त) के मौके पर पाकिस्तानी हुक्मरानों को यही सलाह दी जा सकती है कि पड़ोसियों के लिए समस्या खड़ी करने के बजाय वे अपने देश और अपनी अर्थव्यवस्था पर ध्यान दें तो यह न सिर्फ उनके लिए बल्कि सबके लिए बेहतर होगा।

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