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राजस्थान: कांग्रेस को राहत

Edited By Shivendra Suman | नवभारत टाइम्स | Updated:

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पिछले एक महीने से राजस्थान की कांग्रेस सरकार पर चला आ रहा संकट मंगलवार को कम से कम ऊपरी तौर पर समाप्त हो गया, जब सचिन पायलट समेत सभी बागी विधायक जयपुर लौट आए। इन सबने साफ-साफ कहा कि वे अपनी पार्टी और राजस्थान सरकार के साथ हैं। इसके बाद अशोक गहलौत सरकार के बहुमत को लेकर जताए जा रहे सभी संदेह खत्म हो गए हैं। जाहिर है, कांग्रेस और अशोक गहलौत दोनों के लिए यह राहत की बात है। खासकर गहलौत के लिए दोहरी खुशी का मौका है। न केवल उनकी सरकार बनी रह गई बल्कि उनकी ताकत भी पहले से ज्यादा हो गई।

बागी विधायकों की वापसी का यह पल भी इसीलिए आया क्योंकि यह साफ हो चुका था कि सरकार बचाने लायक बहुमत गहलौत के पास है। इसके बाद सचिन पायलट खेमे में भगदड़ मचना स्वाभाविक था। अगर पायलट अपनी तरफ से पहल नहीं करते तो विधायक खुद ही गहलौत की शरण में आ जाते। यह प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी। लिहाजा सचिन खुद आगे आए और कांग्रेस नेतृत्व ने इस मौके का फायदा उठाते हुए उनकी वापसी को यथासंभव सम्मानजनक बनाने का इंतजाम किया। हालांकि यह कितना सम्मानजनक बन पाया है, कहना कठिन है।

इस पूरे प्रकरण में अगर कोई सबसे ज्यादा नुकसान में रहा तो वह सचिन पायलट ही हैं। इस प्रकरण से पहले पायलट की प्रदेश के अंदर और बाहर जो साख थी, उसमें साफ तौर पर बट्टा लगा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सचिन पायलट का यह नुकसान खुद कांग्रेस का ही नुकसान नहीं है, और क्या गहलौत सरकार के बच जाने से कांग्रेस की समस्या सुलझ जाएगी? जाहिर है, इन दोनों सवालों के जवाब हां में नहीं दिए जा सकते। राजस्थान न तो ऐसा पहला राज्य है और न आखिरी, जहां कांग्रेस के होनहार माने जाने वाले युवा नेता हाशिये पर धकेले जाते दिखे हैं।

मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इसका जवाब कमलनाथ की सरकार गिराकर दिया, राजस्थान में सचिन पायलट ने भी ऐसी कोशिश की पर नाकाम रहे। पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से मतभेदों का खामियाजा भुगतते हुए कैबिनेट से बाहर होकर पार्टी में उपेक्षित पड़े हैं, साथ में प्रताप सिंह बाजवा और शमशेर सिंह दुलो भी मुख्यमंत्री के विरोध की आंच झेल रहे हैं। महाराष्ट्र, जहां कांग्रेस तीसरे घटक के तौर पर सरकार में है और उन तमाम राज्यों में, जहां वह विपक्ष में है, किसी न किसी के पार्टी छोड़ने की बात चलती रहती है। इस बदअमली की एक वजह जगजाहिर है कि कांग्रेस में आला कमान का रोल और उसका दबदबा कम हो गया है। ऐसे में प्रदेशों के क्षत्रप अपने यहां जैसे चाहते हैं वैसे पार्टी चला रहे हैं। इसका नुकसान न केवल उनके विरोधी कांग्रेस नेताओं को बल्कि पार्टी को भी भुगतना पड़ता है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष की जरूरत हमेशा होती है, इसलिए देश की भलाई भी इसी में है कि कांग्रेस नेतृत्व अपनी मुश्किलों का हल जल्दी खोज ले।

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