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रक्षा में आत्मनिर्भरता

‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य की ओर एक बड़ा कदम बढ़ाते हुए सरकार ने रविवार को रक्षा से जुड़ी ऐसी 101 वस्तुओं की सूची जारी की, जिनके आयात पर अगले पांच साल के लिए रोक लगी रहेगी। इसका मकसद इन वस्तुओं के देश के अंदर ही उत्पादन को बढ़ावा देना है। जिन वस्तुओं के आयात पर रोक लगाने का फैसला किया गया है, उनमें गोला-बारूद से लेकर राइफल, तोप, राडार, मालवाहक विमान, हल्के लड़ाकू हेलिकॉप्टर, मिसाइल डिस्ट्रॉयर, पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी, संचार उपग्रह आदि तमाम तरह की चीजें शामिल हैं।

अप्रैल 2015 से अगस्त 2020 के बीच यानी पिछले पांच साल की अवधि में इनके आयात के कुल 260 सौदे हुए हैं, जिनका मूल्य 3.5 लाख करोड़ रुपये है। जानकार ठीक ही कह रहे हैं कि इस फैसले की बदौलत अगले छह-सात वर्षों में घरेलू इंडस्ट्री को करीब 4 लाख करोड़ रुपये के ऑर्डर मिलने वाले हैं। रक्षा के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत काफी पहले से महसूस की जा रही है। खासकर कारगिल युद्ध के बाद इस चर्चा में काफी तेजी आई थी। यहां तक कि मेक इन इंडिया स्कीम में भी देश में को विकसित करने की बात कही गई थी। मगर इस दिशा में कोई बड़ी प्रगति अब तक नहीं दर्ज की जा सकी है, जिसका एक बड़ा कारण निश्चित और प्रतिबद्ध मांग के अभाव को माना जाता रहा है।

रक्षा वस्तुओं के उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी लगाने की जरूरत पड़ती है, और जब तक यह गारंटी न हो कि बनाया गया माल समय से खरीद लिया जाएगा, तब तक कोई भी निवेशक इसमें हाथ नहीं डालना चाहेगा। रविवार की इस घोषणा के जरिये सरकार ने यह बाधा दूर कर दी है। निश्चित रूप से यह देश में रक्षा उद्योग के फलने-फूलने का एक बड़ा आधार साबित होगा, लेकिन अभी इसमें कुछ दिक्कतें भी हैं।

देश के कुछ बड़े औद्योगिक घरानों ने विदेशी हथियार निर्माता कंपनियों के सहयोग से इस दिशा में आगे बढ़ना शुरू कर दिया है। ऑर्डर की गारंटी हो जाने के साथ हम निकट भविष्य में उन्हें उत्पादन इकाइयां लगाने की प्रक्रिया में जाते देख सकते हैं। कुछ मामलों में उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों का मुकाबला करना पड़ेगा, लेकिन अंतिम रूप से मामला चीजों के निर्धारित मानकों के अनुरूप होने और उनकी कीमत इतनी होने का रहेगा कि उन्हें घर में खरीदना बाहर से मंगाने की तुलना में पछतावे का सौदा न लगे।

यह हो जाए तो फिर एक ही सवाल बचेगा कि स्वदेशी के प्रति जताई जा रही प्रतिबद्धता क्या सीमा पर संकट के वक्त भी कायम रहेगी। हमारी सेना हर चुनौती से निपटने में सक्षम है और हम किसी भी स्थिति का मुकाबला करने को तैयार हैं, ऐसी तमाम घोषणाओं के बावजूद अक्सर देखा जाता है कि जैसे ही सीमा पर तनाव बढ़ता है, विदेशों से रक्षा खरीद अचानक बढ़ जाती है और देखते-देखते दसियों हजार करोड़ के सौदे हो जाते हैं। आत्मनिर्भरता की परख दरअसल ऐसे क्षणों में ही होती है।

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