Home Reviews एक्टर को इंसान बनना सिखाया अल्काजी ने

एक्टर को इंसान बनना सिखाया अल्काजी ने

लेखक: सुशांत सिंह।।
तब मैं किरोड़ीमल कॉलेज की प्लेयर्स सोसाइटी से जुड़ा था। एक दिन मेरी एक मित्र ने कहा कि बहुत अच्छा नाटक हो रहा है, देखने चलो। थिएटर में मैंने शायद वह पहला प्रोफेशनल नाटक देखा। ये नाटक था, ‘दिन के अंधेरे।’ उसमें सीमा विश्वास और प्रतिमा काजमी थीं। परदे गिरे तो देखा कि कास्ट के साथ सूट-बूट-कैप में बड़ा ही पढ़ा लिखा दिखने वाला एक आदमी है। थिएटर में पढ़े-लिखे तो सारे ही होते हैं, पर हमें तो आदत थी फटी जींस, कुर्ता और झोला देखने की। पता चला कि यह तो इब्राहीम अल्काजी हैं। भारतीय रंगमंच के पितामह।

इत्तेफाक से कुछ ही दिनों बाद लिविंग थिएटर का विज्ञापन देखा। तय किया कि इसी आदमी के साथ काम करना है। तब तक पूरी हिस्ट्री खंगाल ली थी। एनएसडी से निकले बड़े-बड़े दिग्गज इन्हीं की डायरेक्टरशिप के दौरान निकले हैं। मुझे यकीन नहीं था कि मेरा सिलेक्शन हो जाएगा। फॉर्म भरा, ऑडिशन दिया, सिलेक्शन भी हो गया। वहां से एक अलग ही यात्रा शुरू हुई। पता चला कि हमें तो एक्टिंग का ‘ए’ भी मालूम नहीं था। 15 अक्टूबर 1992 को शुरू हुआ हमारा कोर्स फरवरी 1996 तक चला। हमने उनके साथ चार साल बिताए। एक्टिंग के बारे में जो कुछ सीखा, वहीं से सीखा है। मैंने उनसे बेहतरीन टीचर देखा ही नहीं।

Vani Tripathi Tikoo: I will always remember Ebrahim Alkazi as a ...उन्होंने मुझे ‘अ स्ट्रीटकार नेम्ड डिजायर’ में स्टेनली कोवालास्की का रोल दिया था। वह अमेरिकन एक्स फौजी है- लहीम-शहीम बॉडी। हमें तो खाने को कॉलेज वाले सीकड़े ही ढंग से नहीं मिलते थे। जब उन्होंने बताया कि इस आदमी की बॉडी से सेक्सुएल्टी निकलनी चाहिए, ये आदमी रॉ एनिमल है, स्टेला भी इसकी सेक्सुएल्टी से मोहब्बत करती है, वरना तो ये एकदम से खोखला आदमी है। ये स्टेला से मोहब्बत करता है, पर इसकी मोहब्बत फिजिकल है। मुझसे वे बोले, ‘तुम्हारे शरीर से सेक्सुअलिटी दिखनी चाहिए।’ फिर मैंने वर्जिश करनी शुरू की। तेरह सौ रुपए की एक साइकिल ली और उसी से केएम कॉलेज से मंडी हाउस जाता। बॉडी अच्छी बन गई, लेकिन कैरेक्टर इतना ज्यादा जेहन में उतर गया कि मैं सड़क चलते लोगों से लड़ने लगा था।

उनका सेट डिजाइन भी कमाल का था। सेट में ऊपर की एक सीलिंग में एक दीमक लगी बल्ली लग गई थी। हम लोग स्टेज पर थे, रिहर्सल टेक्निकल थी। अचानक ऑडिटोरियम से कोई चिल्लाया, ‘अरे! अरे!’ हमने देखा कि ऊपर से बल्लियां नीचे गिर रही थीं और अल्काजी साहब सेट पर थे। सब बचने के लिए इधर-उधर कूदने लगे। जो लोग ऑडिटोरियम से देख रहे थे, उन्होंने बताया कि चचा (हम और सभी पुराने लोग अल्काजी साहब को चचा कहते थे) का हाथ कुछ यूं ऊपर उठ गया था कि जैसे सारी बल्लियां खुद ही रोक लेंगे।

लिविंग थिएटर के लिए अल्काजी साहब कहीं से फंडिंग नहीं लेते थे। नाटक अपने खर्चे से करते, हमें ट्रेन अपने खर्चे से कराते और कुछ लोगों को स्कॉलरशिप भी देते। रिहर्सल स्पेस का किराया उनकी जेब से ही जाता। उन्होंने हम पर निस्वार्थ मेहनत की और वापस कभी कुछ नहीं चाहा। सिवाय इसके कि मैं जो कुछ दे रहा हूं, तुम ले लो। एक ऊंचे गुरु की तरह उनका मानना था कि उनके पास जो कुछ भी है, वह बांटने के लिए है। कितने टैलंट्स को उन्होंने आगे बढ़ाया। चाहे पेंटर हों या राइटर्स। फटॉग्रफी में अंग्रेजी राज का सबसे बड़ा आर्काइव उनके पास था।

शनिवार को हमारी रिहर्सल सुबह नौ से लेकर एक बजे तक हुआ करती थी, जिसमें वे एक स्लाइड शो तैयार करके लाते थे। ग्रेट पेंटर्स की पेंटिंग हमको दिखाते, उन्हें एक्सप्लेन करते। स्ट्रोक्स देखिए, लाइट का डायरेक्शन देखिए, कैरेक्टर्स की बॉडी लैंग्वेज देखिए। फिर उसको एक्टिंग में रिक्रिएट करवाते। गर्मियों की छुट्टियों में जब उन्हें बाहर जाना होता, तो रींडिंग लिस्ट देकर के जाते थे कि आप पढ़िए। म्यूजिक की लिस्ट देकर के जाते थे। असाइनमेंट देकर के जाते थे ताकि हमारा डिवेलपमेंट चलता रहे। मुझे पोएट्री पर असाइनमेंट दिया था। पहले ही दिन एक्सप्लेन कर दिया था कि जो थिएटर, लिटरेचर आपको सिखा रहा हूं, तो इसलिए ताकि आप एक बेहतर इंसान बन सकें। बाकी एक्टर तो आप अपने आप बन जाएंगे।

(प्रस्तुति : अमितेश सिंह)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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