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सोने की चकाचौंध

Edited By Shivendra Suman | नवभारत टाइम्स | Updated:

गोल्डगोल्ड

आजकल हम असामान्य और कई मामलों में अभूतपूर्व दौर से गुजर रहे हैं। यह बात दूसरी तमाम चीजों के साथ-साथ सोने के लगातार चढ़ते भावों से भी जाहिर हो रही है। दुनिया के स्तर पर सोने में जबर्दस्त तेजी दिखाई दे रही है। ग्लोबल कमोडिटी मार्केट में यह बीते मंगलवार 2000 डॉलर प्रति ट्रॉय आउंस से ज्यादा हो गया। ट्रॉय आउंस सोना और अन्य कीमती धातुओं का वजन नापने की अंतरराष्ट्रीय इकाई है और यह 31.1034768 ग्राम के बराबर होता है।

यह लगातार तीसरा हफ्ता है जब सोना 1900 डॉलर के बेंचमार्क से ऊपर रहा। 2011 के बाद से यह पहला मौका है जब इतनी लंबी अवधि तक सोना इस ऐतिहासिक ऊंचाई पर बना रहा।

बहरहाल, भारत में सोने की ऊंचाईं पर नजर डालें तो यह ग्लोबल से भी ज्यादा है। बीते बृहस्पतिवार को अपने यहां यह 57,700 रुपया प्रति दस ग्राम के भाव पर बिका। पस्ती के माहौल में सोने की यह चकाचौंध दांतों तले उंगलियां दबाने को मजबूर कर देती है, हालांकि अपने देश में सोने का ग्राफ जब-तब ही थोड़ा नीचे आता है, फिर जल्द ही ऊपर का रुख कर लेता है।

नब्बे के दशक में आए भूमंडलीकरण के दौर के बाद से देखें तो 1992 में यह 4334 रुपये प्रति 10 ग्राम पर था। साल-दर-साल घटते-बढ़ते हुए 1996 में एक बार 5000 की सीमा पार करने के बाद भी 2002 में यह पांच हजार के अंदर ही था। खासकर 2004 के बाद लंबी छलांगें लगाते हुए 2012 में इसने पहली बार 30,000 रुपये प्रति 10 ग्राम की सीमा पार की। हालांकि दोबारा यह करतब दिखाने में उसे छह साल लगे। 2018 में 31,438 पर आने के बाद पिछले साल इसकी ऊंचाई 35,220 रुपये प्रति दस ग्राम दर्ज की गई। यहां से देखने पर अंदाजा मिलता है कि इसकी मौजूदा ऊंचाई कितनी अस्वाभाविक है।

बहरहाल, समस्या वैश्विक है और इसे भारत तक सिमटाकर देखने का कोई औचित्य नहीं है। कोरोना और लॉकडाउन से जुड़ी मजबूरियों ने सारे निवेशों को गैर-भरोसेमंद बना दिया है। अमेरिका के दस वर्षीय ट्रेजरी नोट पर मुनाफा इस हफ्ते 0.52 फीसदी दर्ज किया गया जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। भारत में हालात कुछ मामलों में वहां से ज्यादा बुरे हैं। अपना पैसा कहीं भी रखना निवेशकों को सेफ नहीं लग रहा।

कोई सोच सकता है कि कुछ लोग सोने की खरीद-बिक्री से धुआंधार पैसे कमा रहे होंगे, लेकिन यह प्रवृत्ति सोने में निवेश करके मुनाफा कमाने की उतनी नहीं है, जितनी टैक्स से बचने के लिए अपने पैसे को निर्जीव पूंजी में बदल कर किसी गुप्त ठिकाने पर सुरक्षित रखने की। विशेषज्ञ उम्मीद जता रहे हैं कि यह रुझान ज्यादा नहीं चलेगा और दो-तीन महीने में हालात सुधर जाएंगे। लेकिन अपने देश में धन को सोने की शक्ल में देखने की बीमारी इतनी पुरानी है कि यह कोरोना से जुड़े संकटों का एक और पहलू भी साबित हो सकती है।

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