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गांधी जी तो सिर्फ आंदोलन करते थे फिर भारत छोड़ो, अगस्त क्रांति कैसे बन गया?

हेगेल ने लिखा कि प्रत्येक महान घटना या विभूति इतिहास में दो बार अवतरित होती है. कार्ल मार्क्स ने इस इस पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि हेगेल यह जोड़ना भूल गए कि पहली बार वह त्रासदी होती है और दूसरी बार प्रहसन. लेकिन अक्सर देश और समाज महानता को किसी भी रूप में दुहराने में खुद को अक्षम पाता है. तब वह पहले की पैरोडी करके ही खुश हो लेता है.

नंगे बदन, गोल फ्रेम का चश्मा लगाकर गांधी का भेस धरने की परंपरा तो इस देश में है ही जो कतई फूहड़ लगती है. उन्होंने जो महान आंदोलन शुरू किए और जिनका नेतृत्व किया, उनकी भी पैरोडी की जाती है. मसलन, दांडी अभियान की नकल पर उसी रास्ते पर उतनी ही दूर गांधी का स्वांग धरे किसी कृशकाय व्यक्ति के साथ चलती हुई भीड़! या चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी के मौके पर वापस चंपारण जाना. जबकि चंपारण की आत्मा वहां से बहुत दूर मध्य प्रदेश में मेधा पाटकर के आंदोलन में फिर से खुद को व्यक्त करती दिखलाई पड़ती है. मेधा के साथ जो बर्ताव सरकार ने किया, उससे कहीं सभ्य ब्रिटिश सरकार का व्यवहार गांधी के साथ था. और हम आज की निचली या पहली अदालतों से भी उस न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते जो मोतिहारी की 1917 की अदालत ने गांधी की गिरफ्तारी के बाद उन्हें बिना जमानत के छोड़ते हुए किया था.

गांधी और ब्रिटिश हुकूमत के बीच चलने वाले संघर्ष में ब्रिटिश पक्ष ने अपनी कठोरता कभी नहीं छोड़ी लेकिन अक्सर सभ्यता का दामन भी नहीं छोड़ा. गांधी ने भी अपनी टेक नहीं बदली लेकिन कभी ब्रिटिश हुक्मरान को नीचा दिखाने या उन्हें अपमानित करने वाला कोई वक्तव्य कभी नहीं दिया. दो धुर विरोधियों में तकरीबन चार दशक तक चलने वाली कशमकश को राजनीतिक संवाद में सभ्यता और शालीनता की मिसाल के तौर पर भी पढ़ा जा सकता है.

1942 के आंदोलन में भी गांधी ने बार-बार कहा कि उनका मकसद ब्रिटिश हुकूमत की बेहुरमती कतई नहीं, आंदोलन कहीं से उसे लज्जित करने के लिए नहीं किया जा रहा. लेकिन यह आंदोलन गांधी के दूसरे आंदोलनों से भिन्न था.

क्रांति शब्द नौ अगस्त से शुरू हुए आंदोलन के साथ जुड़ा है. खुद गांधी ने भी इस शब्द को स्वीकार किया था. संचार व्यवस्था ठप कर देना, रेल की पटरियां उखाड़ना, जनता और अंग्रेज़ी पुलिस के बीच मुठभेड़, जेल से बंदियों का भाग निकलना; 1942 में उत्तेजना और नाटक की कमी नहीं है. इसे नोट किया गया कि यह गांधी के अन्य आंदोलनों से कतई अलग था. इसे हिंसक कहा जा सकता था. बाद में अंग्रेज़ी हुकूमत ने इस हिंसा के लिए गांधी और कांग्रेस को जिम्मेवार ठहराया.

दिलचस्प यह है कि गांधी ने यह तो माना कि आंदोलन में हिंसा हुई लेकिन उन्होंने पिछले आंदोलनों की तरह उसका जिम्मा लेने से इंकार कर दिया. यह इसलिए कि उनके हिसाब से नौ अगस्त से जो कुछ भी शुरू हुआ उसकी जिम्मेदारी न तो उन पर और न कांग्रेस पर डाली जा सकती है. वजह यह कि नौ अगस्त तो इत्तेफाक था. न तो गांधी ने यह तारीख चुनी थी, न कांग्रेस ने. अंग्रेज़ी सरकार ने कांग्रेस के ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के पारित होते ही गांधी समेत कांग्रेस के सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था.

सात अगस्त को कांग्रेस की बैठक बंबई में होने वाली थी. उसके पहले ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के खिलाफ प्रचार तेज कर दिया. भारत सरकार के सचिव सर फ्रेडरिक पुकल ने 17 जुलाई, 1942 को एक परिपत्र जारी किया. इसमें प्रस्ताव के खिलाफ जनमत तैयार करने के लिए प्रचार तेज कर देने पर जोर दिया गया. यह कहा गया कि जो समर्थक हैं उन्हें और पक्का करने और जो हिचकिचा रहे हैं, उन्हें कांग्रेस से दूर करने के लिए जो कुछ भी किया जा सकता है, किया जाना चाहिए. इरादा कांग्रेस के खिलाफ कार्रवाई की सूरत में भारतीय, ब्रिटिश और विश्व जनमत को अपनी ओर करना था.

गांधी ने इस गोपनीय परिपत्र को जाहिर करके खूब प्रचारित किया. उन्होंने इस गोपनीय घृणा प्रचार पर अफसोस करते हुए लिखा कि श्रेयस्कर होगा कि सरकार खुले तौर पर जनमत को हर तरह से प्रभावित करे और उसके फैसले का पालन करे. कांग्रेस जनमत संग्रह या किसी और जायज और विवेकपूर्ण तरीके से संतुष्ट रहेगी जिससे जनमत की जांच हो सके और उसके बाद के निर्णय को स्वीकार कर लेगी.

गांधी ने इस परिपत्र को सार्वजनिक करते हुए कहा कि इस तरह की सरकारी कोशिश एक और वजह है ‘भारत छोडो’ अभियान के लिए.

नौ अगस्त के बाद की कार्रर्वाई का जिम्मा लेने से इनकार करने का कारण गांधी के सामने बहुत साफ़ था. उनका तरीका कभी भी गोपनीयता का नहीं था. आठ अगस्त के ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के बाद के अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा, ‘…असली संघर्ष इसी क्षण आरंभ नहीं होता. आपने सिर्फ अपनी सारी ताकत मेरे हाथ दे दी है. अब मैं वाइसराय से मिलने का इंतजार करूंगा और उनसे कांग्रेस के प्रस्ताव को स्वीकार करने का अनुरोध करूंगा. इस प्रक्रिया में दो से तीन हफ्ते लगेंगे. इस दरम्यान आप क्या करेंगे? इस बीच का कार्यक्रम क्या होगा जिसमें सब शिरकत कर सकें? जैसा आपको पता है, चरखा पहली चीज़ है जो मेरे मन में आती है…’

चरखे को लेकर मौलाना आज़ाद को शक था. बाद में वे इससे सहमत हुए. गांधी ने सबको चौदह सूत्री रचनात्मक कार्यक्रम को जारी रखने को कहा.

‘और क्या करना है आपको? मैं बताऊंगा. इसी क्षण से आपमें से हर कोई खुद को आज़ाद मर्द या औरत समझे और ऐसे बर्ताव करे मानो सब आज़ाद हैं और इस साम्राज्यवाद के बूटों के नीचे नहीं हैं.’

गांधी ने अपने पुराने सिद्धांत के मुताबिक़ गोपनीयता से सावधान किया: ‘कुछ भी गोपनीय ढंग से नहीं किया जाना चाहिए. यह एक खुला विद्रोह है. इस संघर्ष में पोशीदगी पाप है. आज़ाद शख्स कभी भी लुका-छिपा काम नहीं करेगा. यह कतई मुमकिन है कि आपको जब आज़ादी मिल जाए, आपकी अपनी सीआईडी हो. मेरी सलाह के खिलाफ, लेकिन इस संघर्ष में हम सब खुलेआम काम करेंगे और सीने पर गोलियां झेलेंगे, बिना पीछे मुड़कर भागे.’

गांधी को अभी वाइसराय को ख़त लिखना था और अपने कायदे के मुताबिक़ उनकी इजाजत के बाद उसे सबके लिए प्रकाशित करना था.

ब्रिटिश हुकूमत ने यह नहीं होने दिया. गांधी उसी रात गिरफ्तार कर लिए गए. वाइसराय को ख़त नहीं लिखा गया. गांधी के मुताबिक़ प्रस्ताव और आंदोलन के बीच जो अंतराल होना था वह ब्रिटिश सरकार ने एक झटके में मिटा दिया. इस तरह नौ अगस्त को ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन शुरू हो गया. लेकिन गांधी सही थे: इसका जिम्मा तो सरकार को लेना था, वे तो खुद उसकी कैद में थे.

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