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370 के बिना कश्मीर

Edited By Shivendra Suman | नवभारत टाइम्स | Updated:

जम्मू ऐंड कश्मीरजम्मू ऐंड कश्मीर

संविधान के अनुच्छेद 370 के जरिए जम्मू-कश्मीर को दिया गया विशेष दर्जा समाप्त करने के ऐतिहासिक फैसले को आज एक साल पूरा हो रहा है। विभिन्न वजहों से देश में यह धारणा बनी हुई थी कि अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया गया तो इस राज्य का भारत में रहना कठिन हो जाएगा। लेकिन बीते एक साल का तजुर्बा बताता है कि इस बीच न तो जम्मू-कश्मीर के अंदर कोई बड़ी उथल-पुथल हुई और न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह कोई बड़ा मुद्दा बना।

फिर भी इस फैसले के नफा-नुकसान के आकलन के लिए एक वर्ष का समय पर्याप्त नहीं है। अनुच्छेद 370 का खात्मा बीजेपी की उन वैचारिक प्रस्थापनाओं में था, जिसके प्रति प्रतिबद्धता को उसके अस्तित्व से जोड़कर देखा जाता रहा है। ऐसे में उसके पूर्ण बहुमत वाली सरकार बन जाने के बाद इस वादे को जमीनी शक्ल दिया जाना स्वाभाविक था।

जम्मू-कश्मीर से बाहर पूरे देश में इसे लेकर कोई विरोध नहीं था। संसद में जिन दलों ने इस पर सवाल उठाए, वे भी इस कदम को अनुचित नहीं, गैरजरूरी बता रहे थे। उनके मुताबिक इसके लिए जम्मू-कश्मीर सहित पूरे देश में सर्वसम्मति बनने का इंतजार किया जाना चाहिए था। मगर सरकार ने इसे न केवल देश के लिए बल्कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के हित में भी जरूरी बताया।

इस खास कसौटी पर कसकर देखें तो बीता एक साल जम्मू-कश्मीर के लोगों को खास सुकून पहुंचाने वाला नहीं लगता। फैसले के बाद राज्य में जिन 444 लोगों पर पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) लगाया गया था, उनमें से 300 लोग रिहा किए जा चुके हैं, लेकिन शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए कड़े कदम आज भी ज्यों के त्यों बने हुए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती पर पीएसए की अवधि एक बार फिर बढ़ा दी गई है।

गृह मंत्रालय के मुताबिक इस अवधि में बनाए गए नए डोमिसाइल कानून ने पाकिस्तान से उठकर आए शरणार्थियों, गुरखों, पंजाब से लाकर बसाए गए सफाई कर्मचारियों और राज्य के बाहर विवाह करने वाली महिलाओं को राहत की सांस लेने का मौका दिया है। उनके साथ हो रहा भेदभाव खत्म हुआ है, अचल संपत्तियों की रजिस्ट्री उनके नाम पर होने लगी है और राज्य सरकार की नौकरियों के लिए आवेदन करना उनके लिए आसान हो गया है। लेकिन नौकरियों की हालत आज भी पहले जितनी ही बुरी है। अनुच्छेद 370 खत्म करने के फैसले के कुछ ही सप्ताह बाद राज्यपाल ने तीन महीने के अंदर 50 हजार नौकरियां आने की घोषणा की थी लेकिन इसका अमल में उतरना अभी बाकी है।

उलटे जम्मू-कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के मुताबिक इस एक साल में चार लाख लोगों की नौकरियां छिन गई हैं। घाटी में सामान्य जीवन और लोकतांत्रिक अधिकार सपना हो गए हैं। यह स्थिति लंबे समय तक नहीं बनी रह सकती। अपने फैसले की सार्थकता सिद्ध करने के लिए केंद्र सरकार को वहां जन-जीवन सामान्य बनाने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू करने वाले कदम जल्द से जल्द उठाने चाहिए।

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