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नई पीढ़ियां जिस राम को जानेंगी वह तुलसी का राम होगा, कबीर का? या फिर ठेठ राजनीतिक राम?

‘राम’ भारतीय परंपरा में एक प्यारा नाम है. वह ब्रह्मवादियों का ब्रह्म है. निर्गुणवादी संतों का आत्मराम है. ईश्वरवादियों का ईश्वर है. अवतारवादियों का अवतार है. वह वैदिक साहित्य में एक रूप में आया है, तो बौद्ध जातक कथाओं में किसी दूसरे रूप में. एक ही ऋषि वाल्मीकि के ‘रामायण’ नाम के ग्रंथ में एक रूप में आया है, तो उन्हीं के लिखे ‘योगवसिष्ठ’ में दूसरे रूप में. ‘कम्ब रामायणम’ में वह दक्षिण भारतीय जनमानस को भावविभोर कर देता है, तो तुलसीदास के रामचरितमानस तक आते-आते वह उत्तर भारत में घर-घर का बड़ा और आज्ञाकारी बेटा, आदर्श राजा और सौम्य पति तक बन जाता है.

लेकिन इस लंबे कालक्रम में रामायण और रामकथा जैसे 1000 से अधिक ग्रंथ लिखे जाते हैं. तिब्बती और खोतानी से लेकर सिंहली और फारसी तक में रामायण लिखी जाती है. 1800 ईसवी के आस-पास उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के मुल्ला मसीह फारसी भाषा के करीब 5000 छंदों में रामायण को छंदबद्ध करते हैं. लेकिन इसी क्रम में पुराणों में यहां-वहां राम की अलग-अलग कथाएं ठूंस दी जाती हैं. प्राचीन पाठ में शंबूक वध और राम की रासलीला जैसे विचित्र-विचित्र प्रकार के क्षेपक जोड़ दिए जाते हैं. श्रद्धातिरेक में आनंद रामायण (1600 ईसवी) और संगीत रघुनन्दन जैसी कितनी ही रामकथाएं अस्तित्व में आती हैं जिनमें विवाह के पूर्व ही राम रासलीला हुए करते दिखाई देते हैं. जैन संप्रदाय के ग्रंथ ‘पउमचरियं’ में तो ऐसी रामकथा आती है जहां राम की आठ हज़ार और लक्ष्मण की 16000 पत्नियां बताई जाती हैं. लक्ष्मणाध्वरि जैसे 17वीं सदी के श्रृंगारिक कवि ‘रामविहारकाव्यम्’ के 11वें सर्ग में राम-सीता की जलक्रीड़ा और मदिरापान तक का वर्णन करने लगते हैं.

और आधुनिक भारत में आते-आते पौराणिक कथाओं के अंधानुकरण, ऐतिहासीकरण और राजनीतिकरण का ऐसा दौर शुरू होता है कि राम और रामकथा का पूरा स्वरूप ही गड्ड-मड्ड हो जाता है. सीता की अग्निपरीक्षा लेने और लोकोपवाद के चलते उनका त्याग करने वाला राम नारीवादियों को खटकने लगता है. हमारे वामपंथी मित्रों और दलित चिंतकों के लिए वह शंबूक शूद्र का कथित वध करनेवाला सवर्ण क्षत्रिय बन जाता है. और हिंदूवादी राजनीति करनेवालों तक आते-आते वह अचानक ही कथित ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का राजनीतिक प्रतीक बन जाता है. इन तमाम विरोधाभासों के बावजूद यह तो है ही कि वह आज तक भारतीय लोकमानस में एक मेटा-नैरेटिव के रूप में मौजूद दिखता है. टीवी, सिनेमा और आधुनिक साहित्य तक उसे अपने-अपने तरीके से भुनाता है. इसलिए राम हमारे अवचेतन से कहीं जाता नहीं है. वह बना रहता है, क्योंकि उसे अलग-अलग रूपों में बनाकर रखने वाले लोग हैं हम. वह बना रहता है, क्योंकि हम ही ऐसा चाहते हैं.

लेकिन फिर भी टकराव है. टकराव इसलिए नहीं है कि राम अपने आप में कैसा है. बल्कि टकराव इसलिए है कि उसे अलग-अलग स्वरूपों में बनाकर रखने वाले हम जैसे लोगों के बीच इस पर सहमति नहीं है. लेकिन सवाल है कि जब हम उसे अलग-अलग विरोधाभासी रूपों में बनाकर रखना ही चाहते हैं, तो नई पीढ़ियां उस राम को कैसे समझें. धर्म, भक्ति, श्रद्धा और साहित्य से लेकर इतिहास और राजनीति तक को चटपटे प्रोडक्ट के रूप में परोसनेवाला यह दौर हमारी तुरंता पीढ़ी को राम का कौन सा स्वरूप परोसेगा?

पूछा जा सकता है कि मानवता और विज्ञान के स्वाभाविक विकास के क्रम में यह चिंता ही क्यों होनी चाहिए? चिंता इसलिए कि यह विकास शायद इतना स्वाभाविक और सहज भी नहीं रह गया है. नई पीढ़ियां जिस राम को जानेंगी वह तुलसी का राम होगा, या कबीर का? या फिर वह सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का राम होगा या रामानंद सागर वाला राम होगा? या फिर इस सबसे अलग वह अयोध्या की कथित पुश्तैनी जमीन के लिए कोर्ट-कचहरी से लेकर राजनीतिक दलों के कार्यालयों तक के चक्कर लगानेवाला एक ठेठ राजनीतिक राम होगा? क्या वह शंबूक-वध के लगातार आरोपों से अवसादग्रस्त या प्रतिक्रियावादी हो जानेवाला राम होगा? क्या वह लड़ाकू तेवर में जोर-जोर से अपने जयकारे लगवाने वाला हिंदू हृदय सम्राट राम होगा, जो नवपीढ़ियों के हाथों में लाठी, तलवार और त्रिशूल देखकर प्रसन्न होगा? असल बेचैनी की वजह यही प्रश्न होने चाहिए.

आठवीं सदी यानि आदि शंकर के आस-पास के समय में रचित ग्रंथ ‘अष्टावक्र गीता’ अद्वैत वेदांत का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है. आत्मवादी इस ग्रंथ ने ‘आत्माराम’ शब्द का सुंदर प्रयोग करते हुए कहा- ‘आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः’ — यानी निरंतर आत्मा में रमने वाला आत्माराम ही शीतल और स्वच्छ हृदय का धीरवान संत है. अपनी ही अंतरआत्मा में रमण करने वाले चेतन जीव या ब्रह्म के अर्थ में राम शब्द का प्रयोग संभवतः इससे पूर्व के वैदिक ग्रंथों में भी देखने को मिलता है. लेकिन अष्टावक्र गीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसने जाति, वर्ण, संप्रदाय और ब्रह्मचर्य-सन्यास आदि आश्रमों के झूठे अहंकार या हीनताबोध से स्वयं को दूर करने का आह्वान करते हुए उद्घोष किया था— न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचरः. असङ्गोसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव.. (यानी न तुम ब्राह्मण या क्षत्रिय आदि वर्ण हो, न तुम ब्रह्मचारी, सन्यासी आदि हो, न तुम आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा आदि इंद्रियों से ग्रहण किए जाने वाले हो, बल्कि तुम तो अकेला, अदृश्य और विश्व के द्रष्टा हो. ऐसा समझकर तुम सुखी होओ.)

आगे चलकर कबीर, नानक और रैदास जैसे संतों की वाणी में हमें ऐसे ही आत्माराम रूपी ‘राम’ के दर्शन होते हैं. तुलसीदासजी ने भले ही यह कहते हुए कि राम न सकहिं नाम गुन गाहीं. (यानी स्वयं राम भी इतने समर्थ नहीं हैं कि वह अपने ही नाम के प्रभाव का गान कर सकें) अपने श्रद्धेय के प्रति भक्तिभाव दर्शाया हो, लेकिन राम के नाम को कबीर ने एक अलग ही अर्थ प्रदान करते हुए एक नई ऊंचाई दे दी. जब उन्होंने कहा कि दसरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना (यानि दशरथ के बेटे राम को तो सभी भजते हैं, लेकिन राम नाम का मरम तो कुछ और ही है), तो उन्होंने रामकथाओं में आए राम की तमाम स्थापनाओं को ही एक किनारे रख दिया.

राम नाम और राम की महिमा पर वाद-विवाद में उलझे रहनेवालों पर संत कबीर ने एक बार करुणास्पद कटाक्ष करते हुए कहा— राम गुण न्यारो न्यारो न्यारो. / अबुझा लोग कहां लों बूझै, बूझनहार विचारो.. / केतेहि मुनिजन गोरख कहिये, तिन्ह भी अन्त न पाया.. / जाकी गति ब्रह्मै नहिं जानी, शिव सनकादिक हारे.. / ताके गुण नर कैसेक पैहौ, कहहिं कबीर पुकारे.. हिंदू और मुसलमान के नाम पर लड़नेवाले लोगों को भी कबीर ने यही कहा कि राम रहीमा एकै है रे काहे करौ लड़ाईया फिर यह भी कि — राम रहीमा एक है, नाम धराया दोई, कहे कबीर दुइ नाम सुनि, भरम परो मत कोई. और जब इससे भी सरल रूप में समझाने की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने कहा— राम रमैया घट-घट वासी यानी वह तो हर मनुष्य के भीतर है. हर मनुष्य ही अपने आप में देवता है, देवी है, ब्रह्मा है आदम है.

महात्मा गांधी ने जब ‘रघुपति राघव राजा राम’ और ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम की डोर पकड़ी’ तो उनके जेहन में भी राम का एक बहुत ही सुलझा और कबिराहा स्वरूप ही था. 22 जनवरी, 1921 को यंग इंडिया में उन्होंने रामनाम सुमिरन के नुस्खे का मर्म बताते हुए लिखा था- ‘मेरे लिए राम, अल्लाह और गॉड सभी एक ही अर्थ वाले शब्द हैं.’ इसी तरह राम, कृष्ण या बुद्ध को अवतार घोषित किए जाने के प्रश्न पर विनोबा ने एक बार कहा था- ‘विचार का भी अवतार होता है, बल्कि विचार का ही अवतार होता है. लोग समझते हैं कि रामचन्द्र एक अवतार थे, कृष्ण, बुद्ध, अवतार थे. लेकिन उन्हें हमने अवतार बनाया है. वे आपके और मेरे जैसे मनुष्य थे. …हम अपनी प्रार्थना के समय लोगों से सत्य प्रेम, करुणा का चिन्तन करने के लिए कहते हैं. भगवान किसी न किसी गुण या विचार के रूप में अवतार लेता है और उन गुणों या विचार को मूर्त रूप देने में, जिनका अधिक से अधिक परिश्रम लगता है, उन्हें जनता अवतार मान लेती है. अवतार व्यक्ति का नहीं विचार का होता है और विचार के वाहन के तौर पर मनुष्य काम करते हैं. किसी युग में राम के रूप में सत्य की महिमा प्रकट हुई, किसी में कृष्ण के रूप में प्रेम की, किसी में बुद्ध के रूप में करुणा की.’

राम के नित नए रूपों में निरूपण का सिलसिला शायद अभी भी थमा नहीं है. कुछ साल पहले शिर्डी के साईबाबा को साई ‘राम’ घोषित किए जाने को लेकर उनके अनुयायियों और द्वारिका पीठ के शंकराचार्य के बीच कटु संवादों का आदान-प्रदान शुरू हो गया था. डेरा सच्चा सौदा वाले गुरमीत सिंह ने अपने नाम के साथ ‘राम-रहीम’ का तखल्लुस जोड़कर फिल्मी माध्यम से भी इसका एक अलहदा प्रतिमान गढ़ने की कोशिश की. फिल्मों में वैसे भी ‘राम’ नाम को भुनाने के कुछ अनोखे व्यावसायिक प्रयास हुए हैं. जैसे 1988 में जब ‘राम-अवतार’ नाम की एक बहुचर्चित हिंदी फिल्म आई, तो गांव-देहात के भोले-भाले लोगों को लगा कि यह भगवान राम के अवतार की कहानी है. फिर क्या था तांगे और ट्रैक्टरों में भर-भरकर बेचारे ग्रामीण कस्बाई सिनेमाघरों में आने लगे. लेकिन जब वे सिनेमाघर के भीतर सिनेमा देखना शुरू करते, तो उन्हें ‘राम’ के रूप में एक ऐसा ‘नायक’ देखने को मिलता जो अपनी मोटरकार के रेडिएटर में ही खड़े-खड़े लघुशंका निवारण कर रहा होता.

लेकिन इस सबसे अलग पिछले करीब पच्चीस वर्षों से जब भी छह दिसंबर का दिन आता है, तो लोकमानस में कुछ तस्वीरें उभरने लगती हैं. जैसे कोई टूटता गुम्बज, उसपर चढ़े कुछ उन्मादी लोग. माथे पर भगवा पट्टी बांधे लोगों की भीड़ जिसमें कोई ध्वजा-पताका-झंडा से लैस है, तो कोई लाठी, त्रिशूल या तलवार से. इसके साथ ही किसी ऐसे अवतारी पुरुष की बहुत ही चतुराई से गढ़ी गई एक छवि उभरती है, जिसमें उन्हें भगवा वस्त्र में ही धनुष चलाते हुए एक गठीले शरीर वाले लड़ाके के रूप में चित्रांकित किया गया है. भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को वास्तव में समझने वाले लोगों के लिए यह प्रश्न शायद बराबर बना रहेगा कि ये कैसे रामभक्त थे, जिन्होंने स्वयं राम के नाम पर ही यह सब किया होगा.

उस घटना के लगभग 27 साल बाद भी अब जब रामनवमी के जुलूसों में नई पीढ़ियां कई स्थानों पर अपना ऐसा ही उन्माद प्रदर्शित करती नज़र आती हैं, तो उन्हें यह बताना जरूरी जान पड़ता है कि इसी देश में आध्यात्मिक और व्यापक अर्थों वाले राम को संकीर्ण राजनीतिक राम में बदलने जैसी मूढ़ता भी हुई है. और नई पीढ़ियां इस राजनीतिक राम वाले हिंसक प्रतीकों से जुड़ने के बजाय उस आध्यात्मिक राम को जानने की कोशिश करें, जो अयोध्या वाले किन्हीं दशरथ के बेटे राम से बहुत पहले से ही एक समृद्ध आध्यात्मिक और मुक्तिकारी चिंतन का हिस्सा रहे थे.

विज्ञान युग की नई पीढ़ियां राम और रहीम जैसे शब्दों के ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक अर्थों और संदर्भों को अपनी वैज्ञानिक अनुभूतियों से अवश्य ही समझ पाएंगी. बस उसमें तात्कालिक अड़ंगा लगाने वाला अगर कुछ है, तो वह यही कि राम के नाम पर कथित राम-भक्त और राम-विरोधी दोनों अपनी-अपनी राजनीति करते रहने के लोभ से बाज नहीं आ रहे हैं. यही बात रहीम और रहमान वालों पर भी ठीक उसी तरह लागू होती है. अयोध्या और बाबरी को लेकर लड़ने वाले दोनों तरफ के लोग न तो राम को समझ पाए हैं, न रहीम को.

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