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कविता आत्म की अभिव्यक्ति से अधिक आत्म की रचना भी हो सकती है

कविता की उलझनें

एक अंग्रेजी आलोचक गाब्रियल जासीपोवीची ने वर्डसवर्थ की एक कविता के बारे में कहा है कि उसमें काव्य-दृष्टि नैतिकता से क्षरित होती है. काव्य-दृष्टि पर काबिज होने की कई तत्व कोशिश करते रहते हैं- सामाजिकता, नैतिकता, राजनीति, विचारधारा आदि. ये सभी तत्व ऐसे हैं जिनका कविता आसानी से प्रतिरोध नहीं कर सकती. बल्कि सामान्य कवि ऐसा प्रतिरोध नहीं कर पाते. इस कारण इन दिनों निजता को सामाजिकता के सामने बलि देने, नैतिकता को चुनौती न दे पाने, सही राजनीति अपनाने (पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है’ जैसे प्रश्नों के सम्मोहन में), विचारधारा का अतिक्रमण करने का जोखिम न उठा पाने के कारण कविता में काव्य-दृष्टि का क्षय या क्षति देखने को मिलती है. कविता इन तत्वों का वाहक बनकर या इनमें से किसी को अपने ऊपर काबिज होने देकर अपना अवमूल्यन करती रहती है. दिलचस्प यह है कि कई बार स्वयं कवि को इसका कोई अहसास नहीं होता कि क्षरण हो रहा है.

हाल ही में अपने एक विश्लेषण में कवि ध्रुव शुक्ल ने इसका ज़िक्र किया कि विचाराधारा के लिए अपनी असंदिग्ध प्रतिबद्धता के, मुक्तिबोध का अन्तिम लक्ष्य ‘आत्म-सम्भवा अभिव्यक्ति अनिवार’ पाना है जो आम तौर पर एक प्रगतिशील लक्ष्य नहीं होता. ज़ाहिर है कि मुक्तिबोध अपनी क्लैसिक कविता’ अंधेरे में’ में अपनी वैचारिकता से अपनी कविता को क्षरित होने से बचा रहे हैं. उसी कविता में पहले मुक्तिबोध ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे’ उठाने के ख़तरे की बात भी कर रहे हैं. इसी तरह शमशेर ने अपनी सौन्दर्यपरक ऐन्द्रिय प्रेम कविताओं में कोई वैचारिक हस्तक्षेप नहीं होने दिया है. अगर किसी कवि को विचारधारा से ‘आक्सीजन’ मिलता है तो वह निश्चय ही ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है. पर जब ऐसी विचाराधारा या दृष्टि उसकी काव्यानुभूति या काव्याभिव्यक्ति से मेल नहीं खाती तो उसे छोड़ देने की भी स्वतंत्रता होती है. बड़ा कवि ऐसी स्वतन्त्रता बरतता है और उसकी कविता विचार या अपनी ही दृष्टि से दबाये जाने से बच जाती है.

कविता का क्षरण सिर्फ़ विचारधारा से नहीं और कई वृत्तियों से हो सकता है: जटिलता और सूक्ष्मता का सम्प्रेषणीयता से, निर्भीकता का नैतिकता की सामान्य धारणाओं से, काठिन्‍य का लोकप्रिय सरलता से – कई बार तो इस दबाव से भी कि तथाकथित आलोचक क्या चाहते या पसन्द करते हैं.

कई बार लगता है कि कविता लिखना ख़ासा उलझनों-भरा काम है. उसकी संभावित उलझनों या परिणति से कई बार कवि तक सचेत नहीं होते.

इतिहास, उम्मीद और विफलता

आयरिश कवि शीयस हीनी और पोलिश कवि ज़्बीग्न्येव हेवेर्त लगभग समकालीन थे. हीनी को नोबेल मिला, हेर्वेत को नहीं हालांकि वे उसके सर्वथा सुपात्र थे. हीनी उन अंग्रेज़ी कवियों में से एक थे जिन्होंने हेर्वेत की असाधारण प्रतिभा को पहचाना और उन पर लिखा भी था.

हीनी को यह भरोसा था कि कभी-कभी इतिहास और उम्मीद की तुक मिल जाती है. हेर्वेत अपनी सख्त लेकिन प्रामाणिक नवशास्त्रीयता में इतिहास को विफलता और क्रूरता के निष्करुण वृत्तान्त के रूप में देखते थे. दोनों बड़े कवि हैं और दोनों की कविता में सजग, गहरा, चौकन्ना इतिहास-बोध है. ज़ाहिर है कि उनकी इतिहास की कवि-समझ अलग-अलग है – एक स्तर पर परस्पर विरोधी भी लग सकती है.

यह बार-बार समझ में आता है कवि का काम बुनियादी तौर से कविता लिखना है जो हमें मानवीय सचाई, मानवीय नियति, मानवीय विडम्बना से दो-चार करे एवं भाषा की संभावनाओं और सीमाओं से भी हमें अवगत कराये. ऐसा करने में उसे अनेक क्षेत्रों से मदद, सहारा मिल सकते हैं. कविता हमें इतिहास में अवस्थित भी कर सकती है, इसके पूरे अहसास के साथ कि ऐसा अवस्थान दूसरे अनुशासन भी कर रहे होते हैं. वह हमारे समय के अन्याय, अत्याचार, हिंसा, निर्भयता, आतंक को किसी ऐतिहासिक पूर्वोदाहरण की याद दिलाकर सघन कर सकती है. हमारे समय की महत्वपूर्ण कविता अपने श्रेष्ठ क्षणों में इतिहास और मनुष्य की सम्भावना, उम्मीद, विफलता, विडम्बना आदि का बोध करा सकती है.

इस पर बहस होती रही है कि कवि कविता रचता है या कि कविता कवि को रचती है. कि कुछ देर कवि द्वारा लिखी जाकर कविता स्वायत्त हो जाती है और फिर स्वयं अपने को रचने लगती है – ‘आत्मसंभवा’ हो जाती है. यह भी ज़ेरे-बहस रहा है कि कविता आत्माभिव्यक्ति होती है या कि वह आत्म तक महदूद न होकर पर को भी अभिव्यक्ति की ज़द में ले आती है. मुझे अकसर लगता रहा है कि कवि का आत्म पहले से निश्चित या सुरक्षित नहीं होता: कम से कम कुछ कवि तो ऐसे होते ही हैं जिनका आत्म कविता में ही रचा जाता है, उनके यहां कविता आत्म की अभिव्यक्ति उतना नहीं जितना आत्म की रचना होती है. शमशेर और मुक्तिबोध दोनों ही ऐसे कवि रहे हैं जिनके यहां उनकी कविता ने ही उनका आत्म रचा है: उनके आत्म को कविता के बाहर कहीं अवस्थित करना सम्भव नहीं है, न ही ज़रूरी. दर्शन का बोध भी कविता अकसर नहीं सभ्हाल पाती. पन्त का उत्तर काव्य उनके दर्शन के बोध से चरमराता काव्य रहा है.

कोई उकताकर एतराज कर सकता है कि इतना सब काम कविता पर बोझ डालने जैसा है. हमारा समय ही ऐसा है जो किसी को, कविता को भी, अकेला और निर्भार नहीं छोड़ता, भले निहत्था भी करता जाता है.

मिलने पर इसरार

इस बार दो छोटी जापानी और ग्रीक कविताओं के हिन्दी अनुवाद. उसी संचयन ‘दिस सेम स्काई’ से. छोटी कविताओं के स्वभाव के अनुरूप मर्मवेधी

वसन्तघर (मूसो सोसेकीजापान)

सैकड़ों खुले हुए फूल

सब आये हैं

एक ही शाखा से

देखो,

उनके सारे रंग

मेरे बगीचे में आये हैं

मैं खड़खड़ाता गेट खोलता हूं

और हवा में

देखता हूं

वसन्त की धूप

पहले ही पहुंच चुकी है

असंख्य संसारों में.

साधारणता का अर्थ (यानीस रित्सोज़ (यूनान)

मैं साधारण चीज़ों के पीछे छुप जाता हूं ताकि तुम मुझे पा सको

अगर मैं तुम्हारे हाथ आऊं तो तुम्हें चीज़े मिल जायेंगी तुम छुओगे उसे जिसे मेरे हाथ ने छुआ है

हमारे हाथों की छापें मिल जायेंगी

अगस्त की चांदनी रसोईघर में चमकती है

एक टिनप्लेटेड बर्तन की तरह (वह इस तरह लगती है

क्योंकि मैं जो तुमसे कह रहा हूं)

वह ख़ाली मकान को रोशन करती है और

मकान की झुकती ख़ामोशी

हमेशा ख़ामोशी झुकती रहती है

हर शब्द एक दरवाज़ा है

मेलमिलाप की ओर, जिसे हमने रद्द कर दिया है

और तब जब शब्द सच होता है

वह मिलने पर इसरार करता है

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