Home Reviews मुश्किलों से पूरी उम्र जूझता रहा मैदानों का मुंशी

मुश्किलों से पूरी उम्र जूझता रहा मैदानों का मुंशी

लेखक: जमील गुलरेज।।
मुंशी प्रेमचंद अजीम साहित्यकार हैं, जिन्होंने 315 कहानियां, 15 नॉवेल, दो से तीन ड्रामे, 800 खत और सैकड़ों लेख लिखे। आज उनकी 140वीं सालगिरह पर हम कोशिश कर रहे हैं कि उनके वजूद की अजमत को जितना हो सके, उतना समेट सकें। इस अजीम फनकार की जिंदगी का शुरुआती दौर मुश्किलात भरा रहा।

अपने लेख ‘जीवनसार’, जिसका उर्दू तर्जुमा उन्होंने मुंशी प्रेमचंद की कहानी उनकी जबानी के नाम से किया था, उसमें वे खुद लिखते हैं, ‘मेरी जिंदगी हमवार मैदान की तरह है जिसमें कहीं-कहीं गड्ढे तो हैं, लेकिन टीलों, पहाड़ों, गहरी घाटियों और गुफाओं का पता नहीं है। जिन हजरात को पहाड़ों की सैर का शौक हो, उन्हें यहां मायूसी ही होगी।’ मुंशी जी आगे लिखते हैं, ‘मेरा जन्म संवत 1937 में हुआ। वालिद डाकखाने में क्लर्क थे। वालिदा मरीज थीं। एक बड़ी बहन भी थी। उस वक्त वालिद शायद बीस रुपया पाते थे, चालीस रुपये तक पहुंचते-पहुंचते उनका इंतकाल हो गया। यूं तो वे बड़े दूरंदेश, मोहतात और दुनिया में आंख खोलकर चलने वाले आदमी थे, लेकिन आखिरी उम्र में एक ठोकर खा ही गए और खुद तो गिरे ही थे, उसी धक्के में मुझे भी गिरा दिया। 15 बरस की उम्र में उन्होंने मेरी शादी कर दी, जिसके चंद साल बाद उन्हें सफर-ए-आखरत दरपेश हो गया। उस वक्त मैं नवीं क्लास में पढ़ता था। घर में मेरी बीवी, सौतेली मां और उनके दो लड़के थे। मगर आमदनी एक पैसे की न थी।’

second marriage with a child widow changed the life of munshi ...जिंदगी में संघर्ष के दौरान उनकी तबियत लिखने की तरफ मायल होने लगी और उसी के साथ उनकी दोस्ती कानपुर से छपने वाले उर्दू के रिसाले ‘जमाना’ के संपादक से हो गई। 1901 में उन्होंने अपना पहला नॉवेल लिखना शुरू कर दिया था। 1905 में वे दया नारायण निगम को लिखे खत में अपनी पहली शादी के बारे में बताते हैं, ‘बिरादरम, अपनी बीती किससे कहूं, जब्त किए-किए कोफ्त हो रही है, बीवी साहिबा ने जिद पकड़ी कि यहां न रहूंगी, मायके जाउंगी। मेरे पास रुपया न था, नाचार खेत का मुनाफा वसूल किया, उनकी रुख्सती की, वो रो-धोकर चली गईं, मैंने पहुंचाना भी पसंद न किया। आज उनको गए हुए आठ रोज हो गए हैं, न खत- न पत्तर। मैं उनसे पहले ही नाखुश था, अब तो सूरत से ही बेजार हूं। गालिबन अबकी उनकी विदाई दायमी साबित हो, खुदा करे ऐसा ही हो, मैं बिला बीवी के रहूंगा। इधर ननिहाल से वालिदा जिद कर रही हैं कि ब्याह रचे और जरूर रचे। जब मैं कहता हूं कि मुफलिस हूं, तो वालिदा कहती हैं, तुम अपनी रजामंदी दे दो, तुमसे एक कौड़ी न मांगी जाएगी।’

प्रेमचंद ने शुरू में नवाबराय के नाम से लिखना शुरू किया। ये नाम उन्हें बहुत अजीज था, क्योंकि उनके वालिद उन्हें प्यार से नवाब के नाम से पुकारा करते थे, और ये नाम हिंदू-मुसलमानों की सामाजिक एकता को भी बांधता था। इसी नाम से उन्होंने ‘जमाना’ कानपुर में ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ सहित और जो चार अफसाने लिखे थे, उनका संग्रह सोज-ए-वतन के नाम से छपा। उस समय बंगाल के विभाजन की तैयारियां हो रही थीं। माहौल गरमाया हुआ था। उन पांचों कहानियों में देशप्रेम के तराने भरे हुए थे। उस समय नवाबराय अर्थात धनपत राय हमीरपुर में अंग्रेज सरकार के शिक्षा विभाग में कार्यरत थे। उन्हें कलेक्टर ने बुलाया। मुलाकात के बाद उन अफसानों में देशप्रेम भरा होना राजद्रोह माना गया और उनसे सोज-ए-वतन की सारी कॉपियां जमा करने को कहा गया। साथ ही यह भी कहा गया कि भविष्य में वो लिखित इजाजत के बगैर कुछ नहीं लिखेंगे।

प्रेमचंद इसके कायल नहीं थे। वो सरकार की ज्यादाती बर्दाश्त न कर सके। उन्होंने सोज-ए-वतन की कॉपियां वहां जमा कर दीं और तय किया कि अब वे किसी और नाम से लिखेंगे। दया नारायण निगम का कहना है कि उन्हें प्रेमचंद के नाम से लिखने की सलाह उन्होंने ही दी थी। जवाब में प्रेमचंद ने उन्हें लिखा था, ‘प्रेमचंद अच्छा नाम है, मुझे भी पसंद है। अफसोस बस यह है कि पांच-छह साल में नवाबराय को स्थापित करने की जो मेहनत हुई, वो सब अकारथ गई।’

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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