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बैंकों को बचाना सबसे जरूरी

Edited By Shivendra Suman | नवभारत टाइम्स | Updated:

स्टेट बैंक ऑफ इंडियास्टेट बैंक ऑफ इंडिया

रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने सोमवार को सीआईआई की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में इकॉनमी के उन पांच कारकों की ओर ध्यान खींचा, जो आने वाले समय में सीन बदल सकते हैं। कृषि, इन्फ्रास्ट्रक्चर, वैकल्पिक ऊर्जा, इन्फॉर्मेशन एंड कम्यूनिकेशन टेक्नॉलजी और स्टार्टअप्स को उन्होंने ऐसे स्पॉट्स के रूप में चिह्नित किया जो मौजूदा चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था को हमारी आकांक्षा की उड़ान से जोड़ने की कूवत रखते हैं।

इन संभावनाओं को रेखांकित करते हुए आरबीआई गवर्नर ने इन क्षेत्रों, खासकर कृषि क्षेत्र में प्रस्तावित सुधार का अजेंडा आगे बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया। इन बातों की उपयोगिता और उनके द्वारा चिह्नित क्षेत्रों में मौजूद संभावनाओं को भला कौन खारिज कर सकता है, लेकिन असल बात उन एक-दो बड़ी चुनौतियों से निपटने की है, जिसके बगैर बड़ी से बड़ी संभावना भी अभी के माहौल में खुद को साकार नहीं कर पाएगी।

कृषि क्षेत्र और इन्फ्रास्ट्रक्चर में कितने और कैसे सुधार की जरूरत है, इस पर आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक भी लगातार बोल रहे हैं, जो बिना किसी अपवाद के हर समस्याग्रस्त अर्थव्यवस्था के सामने ऐसी ही ‘रामबाण औषधियां’ लेकर उपस्थित होते हैं। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था पर सरसरी नजर रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि हमारी बीमारी दूर होने की शुरुआत तभी होगी, जब हम अपने बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं को पटरी पर लाने की ओर बढ़ेंगे।

पिछले कई सालों से हमारी बैंकिंग प्रणाली को तबाह कर रहे बट्टाखाता कर्जे (एनपीए) कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं। कुछ बड़े कारोबारियों का बैंकों से भारी-भरकम कर्ज लेकर विदेश भाग जाना समस्या का छोटा पहलू है। ज्यादा बड़ा मामला दिवालिया घोषित हो चुके या इसके करीब पहुंच रहे बड़े और मझोले उद्यमों का है, जिनसे सारी कोशिशों के बावजूद कर्जे की वसूली सपना ही बनी हुई है।

यह समस्या कोरोना काल में और ज्यादा गंभीर इसलिए हो गई है क्योंकि पिछले कुछ महीनों से जारी मोरेटोरियम (कर्ज की किस्तें न जमा करने की छूट) की व्यवस्था के चलते किसी को भनक तक नहीं है कि इस बीच कितना नया एनपीए बैंकों के सिर पर सवार हो गया है। एक बात तो तय है कि लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था की स्थिति पहले से ज्यादा बिगड़ी है। ऐसे में धूर्त और अक्षम कारोबारियों के विपरीत बहुत सारे जेनुइन उद्यमी भी धंधा बिल्कुल न चल पाने के कारण कर्ज वापसी को लेकर हाथ खड़े करने को मजबूर हो सकते हैं। इसके संकेत कई तरफ से मिल रहे हैं।

नौकरी चले जाने, कमाई बंद होने, कारोबार बैठ जाने के कारण रोजमर्रा के खर्च के लिए प्रॉविडेंट फंड और बचत योजनाओं से निकाली गई राशि और पैसा निकालने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सोने का भाव रेकॉर्डतोड़ 52000 रुपये प्रति दस ग्राम के पार चले जाना वित्तीय असुरक्षा का दूसरा नमूना है। ऐसे में आरबीआई की पहली प्राथमिकता देश की बैंकिंग व्यवस्था को बचाने की होनी चाहिए, क्योंकि यहां कोई बड़ा संकट शुरू हुआ तो किसी संभावना का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

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