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बदले हुए मिजाज की कोई वजह तो होगी

तीन दिन पहले बीएसपी ने राजस्थान के अपने विधायकों के लिए व्हिप जारी किया कि उन्हें कांग्रेस के खिलाफ वोट करना है। यहां यह याद कर लेना ज्यादा जरूरी है कि उसके सभी छह विधायक कांग्रेस में शामिल होने का ऐलान कर चुके हैं। यह व्हिप उस विलय को अवैध ठहराने और विधायकों की सदस्यता निरस्त कराने के लिए एक तरह से कानूनी पेशबंदी है। मायावती नहीं चाहती हैं कि उनके साथ दगा करने वाले विधायक सत्ता की चाशनी में डूब कर मजे लेते रहें। वह उन्हें सड़क पर लाकर सबक सिखाना चाहती हैं और यह उनके मिजाज का एक हिस्सा भी है।

विलय को अवैध ठहराने को कुछ दूसरे कानूनी बिंदु भी तलाशे गए हैं, जो कोर्ट में कितना टिक पाते हैं, यह तो समय ही बताएगा। यहां हम उस विषय पर बात नहीं कर रहे। दरअसल बीएसपी का व्हिप जैसे ही पब्लिक प्लेटफॉर्म पर आया, सोशल मीडिया पर उन्हें ‘बीएसपी यानी बीजेपी समर्थक पार्टी’ कह कर ट्रोल किया जाने लगा। ऐसा करने वालों में कांग्रेस के नेता भी शामिल थे। एक साल के अंदर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे दो बड़े मौके पहले भी आए, जब मायावती मोदी सरकार की हिमायत में खड़ी दिखी हैं। जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पर वर्षों से लगी अनुच्छेद 370 की छतरी हटाई थी, तो ‘सेकुलर जमात’ से मायावती ही वह अकेली नेता थीं, जिन्होंने इसका समर्थन किया।

Rajasthan political crisis: Top developments | India News - Times ...फिर पिछले महीने चीन के साथ सीमा पर विवाद और लद्दाख में 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद जब मोदी सरकार विपक्ष के हमलों से घिरी दिख रही थी, तो भी बीएसपी सुप्रीमो ने केंद्र सरकार के साथ अपने को जोड़ा। इस सीरीज में अब जब राजस्थान की कड़ी जुड़ी तो यह सवाल उठना शुरू हो गया है कि क्या मायावती का बीजेपी के साथ कोई अलायंस हो रहा है?

ताज्जुब किस बात का
हालांकि जहां तक अलायंस की संभावना का सवाल है तो अगर ऐसा होता भी है तो उसमें ‘ताज्जुब’ वाला एलीमेंट नहीं है। ताज्जुब तब होता, जब ऐसा पहली बार हो रहा होता। मायावती एक नहीं, बल्कि तीन-तीन बार (वर्ष 95, 96 व 2002) यूपी में बीजेपी के साथ साझा सरकार चला चुकी हैं। 2002 के गुजरात चुनाव में तो बाकायदा गुजरात जाकर नरेंद्र मोदी के लिए वोट की अपील भी कर चुकी हैं। यह वह चुनाव था, जब गुजरात दंगों का मुद्दा चरम पर था, लेकिन मायावती ने उनके मंच पर जाकर सपोर्ट करने की हिम्मत दिखाई थी। मायावती ने जब-जब ऐसा कोई कदम उठाया, यही कहा गया कि ‘अब बीएसपी खत्म,’ लेकिन न तो बीएसपी खत्म हुई और न ही सेकुलर जमात में उसकी स्वीकार्यता। 1995 में बीजेपी के साथ सरकार चलाने वाली बीएसपी के साथ कांग्रेस ने 1996 में यूपी का चुनाव गठबंधन करके लड़ा। 2004 और 2009 की यूपीए सरकार ने भी उसका समर्थन लिया और 2019 के लोकसभा चुनाव में तो समाजवादी पार्टी भी अपने 25 साल पुराने गिले-शिकवे भुलाकर उसके साथ चुनाव मैदान में उतर आई।

Account Of Mayawati's Brother Found With 1.43 Crore, BSP's Bank ...जिस मुस्लिम वोटर के लिए यह कहा जाता रहा कि बीजेपी के साथ जाने पर वह बीएसपी को वोट नहीं करेगा, उसने भी कोई ऐसा गुरेज नहीं दिखाया। हर चुनाव में उसे मुस्लिम वोटरों का उतना वोट मिलता ही रहा, जितना मिलता आया है। अब अगर ऐसा (बीजेपी-बीएसपी अलायंस) फिर से होता है, तो बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए, लेकिन जिस सवाल का जवाब तलाशा जाना ज्यादा जरूरी है, वह यह है कि अगर ऐसा होगा तो क्यों होगा?

ऐसा नहीं लगता कि आज की तारीख में बीजेपी के लिए मायावती किसी तरह की जरूरत हैं। तब की स्थितियां कुछ और थीं, जब यूपी में बीजेपी सबसे निचले पायदान पर हुआ करती थी। अब वह अपनी लीडरशिप की बदौलत यूपी में 300 से अधिक सीटों के साथ सत्ता में है और लगातार दो लोकसभा चुनावों (2014 और 2019) में 80 सीटों में से 60 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज कर रही है। ऐसे में वह अब मायावती के साथ अपना हिस्सा क्यों बांटना चाहेगी?

नजदीकी दिखाने की वजह
कुछ लोगों की राय है कि हो सकता है मायावती को भरोसा हो गया हो कि यूपी में अकेले सरवाइवल मुश्किल है, वे यूपी में बीजेपी की लीडरशिप कबूल कर लें और उसके बदले केंद्र में हिस्सेदारी ले लें। इस व्याख्या को स्वीकारना इसलिए मुश्किल है कि मायावती की राजनीतिक पूंजी सिर्फ यूपी है। वह इसे किसी भी तरह छोड़ नहीं सकतीं। छोड़ना ही होता तो समाजवादी पार्टी के साथ उनका गठबंधन नहीं टूटता, क्योंकि उन्हें मालूम है कि 2022 में अखिलेश भी अपनी दावेदारी नहीं छोड़ने वाले। अब अगर बीजेपी के चश्मे से देखा जाए तो वह मायावती जैसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और राष्ट्रीय पहचान रखने वाली किसी नेता को सरकार में हिस्सेदारी देकर भविष्य के लिए कोई जोखिम कतई नहीं लेना चाहेगी।

ऐसे में यह सवाल बना रहता है कि आखिर मायावती बार-बार बीजेपी के नजदीक क्यों दिखना चाहती हैं? इसकी एक बड़ी वजह यह है कि 2014 में बीएसपी का बेस (दलित वोट) राष्ट्रवाद की बयार में दरक गया था। वह हवा का रुख पहचान रही हैं। इसलिए राष्ट्रवाद के तड़के में लगे किसी मुद्दे पर उसके खिलाफ नहीं दिखना चाहती हैं। इसके जरिए अपने ‘बेस वोटर्स’ को अपने साथ बनाए रखने की उनकी कोशिश है। अनुच्छेद 370 से लेकर चीन तक तमाम मु्द्दों पर उनका समर्थन इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। रही बात गहलोत सरकार के विरोध की, तो कांग्रेस उसके लिए किसी भी तरह फायदेमंद नहीं है। यूपी में प्रियंका की सक्रियता से मायावती का चिढ़ना स्वाभाविक है क्योंकि कांग्रेस की मजबूती राज्य में बीएसपी को कमजोर करेगी। ऐसे में उनकी प्राथमिकता ‘सेकुलरिज्म’ को बचाने से कहीं ज्यादा अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की है। वैसे एक बात बताने को रह गई कि राजनीतिक गलियारों में ‘बहन जी’ के मिजाज की तुलना इंग्लैंड के मौसम से की जाती है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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